Kurukshetra History: श्रीकृष्ण ने महाभारत के लिए क्यों चुनी थी कुरुक्षेत्र की जमीन? जानिए इसके पीछे का खौफनाक राज
सोने के हल से लेकर महाभारत युद्ध की भूमि बनने की पूरी कहानी
Kurukshetra History: हरियाणा का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक गौरव कहा जाने वाला कुरुक्षेत्र जिला अपनी स्थापना के गौरवशाली 53 वर्ष पूरे कर चुका है। 23 जनवरी 1973 को तत्कालीन प्रशासनिक व्यवस्था के तहत करनाल से अलग होकर वजूद में आए इस जिले ने इन पांच दशकों में विकास की एक लंबी और अनुकरणीय इबारत लिखी है। कुरुक्षेत्र सिर्फ एक भौगोलिक टुकड़ा नहीं, बल्कि वह पावन स्थली है जहां भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का अमर उपदेश दिया था।
आज यह पवित्र भूमि देश-दुनिया के करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र तो है ही, साथ ही ‘अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव’ के भव्य आयोजनों ने इसकी ख्याति को सात समंदर पार तक पहुंचा दिया है। वर्ष 2019 में मॉरीशस से शुरू हुआ यह सफर आज कई देशों में अपनी सांस्कृतिक गूंज बिखेर रहा है।
कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था और तेजी से बढ़ता औद्योगिक ग्राफ
कुरुक्षेत्र की रीढ़ आज भी उसकी उपजाऊ मिट्टी और महनती किसान हैं। जिले का लगभग 88 प्रतिशत हिस्सा सीधे तौर पर खेती-किसानी के अंतर्गत आता है। यहां के खेतों में मुख्य रूप से धान और गेहूं की बंपर पैदावार होती है, जबकि नकदी फसलों के रूप में गन्ना, तिलहन और आलू की खेती भी बड़े पैमाने पर की जाती है। कृषि के साथ-साथ जिले ने औद्योगिक मोर्चे पर भी अपनी आत्मनिर्भरता साबित की है। वर्तमान में कुरुक्षेत्र में चीनी मिलें, हथकरघा उद्योग, कृषि एवं जल उपकरण और खाद्य प्रसंस्करण (फूड प्रोडक्ट्स) से जुड़ी छोटी-बड़ी औद्योगिक इकाइयां स्थानीय युवाओं को रोजगार के बड़े अवसर दे रही हैं।
48 कोस के तीर्थों का कायाकल्प और इंफ्रास्ट्रक्चर को रफ्तार
धार्मिक महत्ता की बात करें तो कुरुक्षेत्र की परिधि में आने वाला ’48 कोस’ का सांस्कृतिक क्षेत्र बेहद विस्तृत है। इसमें कुरुक्षेत्र के अलावा पड़ोसी जिले कैथल, करनाल, पानीपत और जींद के करीब 134 ऐतिहासिक तीर्थ स्थल शामिल हैं, जिनका जीर्णोद्धार और सौंदर्यकरण ‘कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड’ (KDB) द्वारा युद्धस्तर पर किया जा रहा है।
बुनियादी ढांचे की बात करें तो पिपली से थर्ड गेट तक करीब 57 करोड़ रुपये की लागत से बन रही फोरलेन सड़क शहर की ट्रैफिक व्यवस्था को नया जीवन देने वाली है। वहीं, 15.44 करोड़ रुपये की लागत से बनकर तैयार हुआ नया लघु सचिवालय भवन अब पूरी तरह क्रियाशील होने जा रहा है, जिससे आम जनता को तमाम सरकारी सेवाएं एक ही छत के नीचे मिल सकेंगी।
घर-घर गैस पाइपलाइन और एलिवेटेड रेल ट्रैक का नया विजन
शहरी सुविधाओं के मामले में भी थानेसर और आसपास के इलाकों का तेजी से आधुनिकीकरण हुआ है। थानेसर क्षेत्र में शुरू की गई डोमेस्टिक पाइपलाइन नेचुरल गैस (PNG) की सुविधा ने गृहणियों को गैस सिलेंडर बुक कराने और उसके खत्म होने के झंझट से मुक्ति दे दी है। आने वाले समय में इस ग्रिड का विस्तार पूरे शहर में करने की योजना है।
यातायात को सुगम बनाने के लिए गुलजारी लाल नंदा मार्ग पर बने रेलवे ओवरब्रिज की ‘सिंगल लेग’ कनेक्टिविटी ने पिपली से रेलवे रोड जाने वाले वाहन चालकों को जाम से बड़ी राहत दी है। इसके अतिरिक्त, शहर के बीचों-बीच करीब 250 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से बन रहे एलिवेटेड रेल ट्रैक का काम भी लगभग 30 फीसदी पूरा हो चुका है, जो भविष्य के कुरुक्षेत्र की नई तस्वीर पेश करेगा।
जनसांख्यिकी और प्रशासनिक स्वरूप में बड़ा बदलाव
बीते दशकों में कुरुक्षेत्र की आबादी और साक्षरता ग्राफ में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। साल 2011 की जनगणना में जहां जिले की आबादी 9.64 लाख थी, वहीं वर्तमान अनुमानों के मुताबिक यह बढ़कर करीब 12.32 लाख के आंकड़े को छू रही है। शिक्षा के क्षेत्र में जिला 76.31 प्रतिशत की साक्षरता दर के साथ आगे बढ़ रहा है, जिसमें पुरुषों की साक्षरता 83.02% और महिलाओं की 68.84% है। जिले का लिंगानुपात 921 है, जिसमें सुधार के लिए लगातार सामाजिक प्रयास जारी हैं।
1573 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले इस जिले को प्रशासनिक सुविधा के लिए 4 सब-डिवीजन, 6 तहसीलों, 7 ब्लॉकों और 420 ग्राम पंचायतों में बांटा गया है। स्थानीय निकाय के रूप में थानेसर नगर परिषद के साथ पिहोवा, शाहाबाद और लाडवा नगरपालिकाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था को जमीनी स्तर पर मजबूत कर रही हैं।
सोने के हल से जुती भूमि और महाभारत की दिलचस्प गाथा
कुरुक्षेत्र का पौराणिक इतिहास अपने आप में विस्मयकारी है। शास्त्रों में वर्णित है कि राजा संवरण के प्रतापी पुत्र राजा कुरु ने इस भूमि पर समृद्धि और धर्म की स्थापना के लिए सोने के हल से सात कोस धरती को जोता था, जिसके बाद इसका नाम ‘कुरुक्षेत्र’ पड़ा। ज्योतिसर में बरगद के प्राचीन वृक्ष के नीचे उपजी गीता की वाणी आज भी प्रासंगिक है। महाभारत के महायुद्ध के लिए इसी भूमि को चुने जाने के पीछे भी एक बेहद दिलचस्प ऐतिहासिक प्रसंग है। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध के लिए जानबूझकर एक ऐसी क्रूर भूमि की तलाश की थी
, जहां मानवीय मोह रिश्तों के आड़े न आए। उनके दूतों ने जब पूरे आर्यावर्त का भ्रमण किया, तो कुरुक्षेत्र में एक ऐसी घटना देखी जहां खेत की मेंड़ (सीमा) के विवाद में सगे बड़े भाई ने अपने छोटे भाई की बेरहमी से हत्या कर दी थी। इस स्थान पर मौजूद प्रतिशोध और क्रोध की इसी भावना के कारण श्रीकृष्ण ने इसे धर्म और अधर्म के अंतिम फैसले के लिए सबसे उपयुक्त रणभूमि माना था। आज का कुरुक्षेत्र अपनी इसी महान ऐतिहासिक विरासत को सीने से लगाए आधुनिक प्रगति की राह पर तेजी से कदम बढ़ा रहा है।
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