Parle-G History: पारले-जी बिस्किट में ‘G’ का असली मतलब जानते हैं आप? जीनियस नहीं, इस वजह से बदला था नाम
आखिर क्या है पारले-जी में इस 'G' का असली रहस्य?
Parle-G History: सुबह की चाय की चुस्की के साथ ₹5 वाले पारले-जी बिस्किट का जुगलबंदी केवल एक नाश्ता नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों का एक इमोशन है। अब यही चहेता ब्रांड कॉरपोरेट जगत में एक नया इतिहास रचने की दहलीज पर खड़ा है। खबर है कि लगभग एक सदी पुरानी कंपनी पारले प्रोडक्ट्स अगले साल भारतीय शेयर बाजार में अपना पहला आरंभिक सार्वजनिक निर्गम यानी आईपीओ (IPO) पेश करने जा रही है। बाजार के गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, कंपनी इस आईपीओ के जरिए करीब 1 अरब डॉलर (लगभग ₹9,530 करोड़) से अधिक का फंड जुटाने की बड़ी तैयारी में है।
आखिर क्या है पारले-जी में इस ‘G’ का असली रहस्य?
पारले-जी की इस बड़ी वित्तीय छलांग के बीच इसके इतिहास और इसके नाम को लेकर भी लोगों की दिलचस्पी बढ़ गई है। आज की पीढ़ी जिसे ‘G for Genius’ के विज्ञापन से जानती है, उसका असल सच कुछ और है। शुरुआत में इस बिस्किट को ‘पारले ग्लूको’ (Parle Gluco) के नाम से लॉन्च किया गया था। 1960 के दशक में जब बाजार में इसी नाम से मिलती-जुलती नकलें आने लगीं, तो असली-नकली के फेर में ग्राहक भ्रमित होने लगे। इस कन्फ्यूजन को दूर करने के लिए कंपनी ने 1982 में एक बड़ा री-ब्रांडिंग दांव खेला और नाम छोटा करके ‘पारले-जी’ कर दिया। यहां ‘G’ का मूल मतलब ‘ग्लूकोज’ ही था, जिसे बाद में शानदार मार्केटिंग के जरिए ‘जी फॉर जीनियस’ बना दिया गया। इसी दौरान पैकेट पर पीले वैक्स पेपर की जगह प्लास्टिक कवर आया और वह मशहूर छोटी लड़की की तस्वीर छपकर सामने आई।
सिर्फ 12 लोगों से शुरुआत, अंग्रेजों के जमाने में विदेशी बिस्किट को दी पटखनी
इस ब्रांड की नींव आजादी से पहले साल 1929 में मोहनलाल दयाल ने मुंबई के विले पार्ले इलाके में एक छोटी सी कैंडी फैक्ट्री के रूप में रखी थी। तब काम शुरू करने के लिए उनके पास कोई बड़ी वर्कफोर्स नहीं थी, बल्कि उनके परिवार के ही महज 12 लोग थे। फैक्ट्री खुलने के ठीक 10 साल बाद यानी 1939 में कंपनी ने बिस्किट के बाजार में कदम रखा। उस दौर में भारत में बिस्किट केवल विदेशों से आते थे, जो काफी महंगे होते थे और आम हिंदुस्तानी की पहुंच से दूर थे। मोहनलाल दयाल ने देश के आम नागरिकों के बजट को ध्यान में रखते हुए बेहद सस्ती कीमत पर स्वदेशी ‘पारले-ग्लूको’ उतारा। यह बिस्किट भारतीय बाजार में इस कदर छा गया कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश-इंडियन आर्मी के जवानों के राशन का यह अहम हिस्सा बन गया।
विभाजन का वो दौर, जब गेहूं की कमी के कारण जौ से बना बिस्किट
पारले-जी के सफर में एक ऐसा दौर भी आया जब देश की आजादी के जश्न के बीच इस ब्रांड का वजूद खतरे में पड़ गया था। साल 1947 में भारत के विभाजन के तुरंत बाद देश में अचानक गेहूं का भारी संकट खड़ा हो गया। बिस्किट का मुख्य कच्चा माल गेहूं होने के कारण पारले को मजबूरन अपने सबसे ज्यादा बिकने वाले ग्लूको बिस्किट का प्रोडक्शन पूरी तरह बंद करना पड़ा। लेकिन कंपनी ने हार नहीं मानी। इस अभूतपूर्व संकट से निपटने के लिए पारले के कारीगरों ने एक नया प्रयोग किया और गेहूं की जगह जौ (Barley) के आटे से बिस्किट तैयार करना शुरू कर दिया, जिससे बाजार में इसकी सप्लाई चेन टूटने से बच गई।
21 देशों का बाजार और सवा सौ से ज्यादा फैक्ट्रियां
आज पारले प्रोडक्ट्स किसी परिचय की मोहताज नहीं है। मामूली शुरुआत करने वाली यह स्वदेशी कंपनी आज दुनिया के 21 से ज्यादा देशों में अपना परचम लहरा रही है और अकेले भारत में इसकी 125 से ज्यादा फैक्ट्रियां संचालित हो रही हैं। समय के साथ कंपनी ने खुद को सिर्फ पारले-जी तक सीमित नहीं रखा। आज बिस्किट के अलावा चॉकलेट, टॉफी, केक, रस्क, स्नैक्स और पैकेज्ड आटे के बाजार पर भी इसका बड़ा कब्जा है। हाइड एंड सीक, क्रैकजैक, मोनाको, किस्मी, मेलोडी और मैंगो बाइट जैसे कई आइकॉनिक ब्रांड्स आज पारले की ही झोली से निकलकर हर घर का हिस्सा बने हुए हैं। ऐसे में अगले साल आने वाला इसका आईपीओ निवेशकों के लिए एक बड़ा मौका साबित हो सकता है।
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