Punjabi Cinema: पंजाब के सिनेमाघरों में पंजाबी फिल्मों का एक भी शो नहीं चलने का मुद्दा अब फिल्म जगत में चर्चा का विषय बन गया है। पंजाबी फिल्म और टीवी एक्टर्स एसोसिएशन ने इस स्थिति पर रोष जताते हुए पंजाबी सिनेमा को सिनेमाघरों में उचित जगह देने की मांग की है। चंडीगढ़ स्थित एसोसिएशन के कार्यालय में आयोजित चर्चा में फिल्मकारों, कलाकारों, लेखकों और पत्रकारों ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखी। चर्चा के दौरान कलाकारों ने सवाल उठाया कि पंजाबी भाषा और संस्कृति से जुड़ी फिल्मों को अपने ही राज्य में दर्शकों तक पहुंचने के लिए पर्याप्त स्क्रीन क्यों नहीं मिल रही हैं। उनका कहना था कि सिनेमाघरों में फिल्मों को जगह मिलने से ही स्थानीय भाषा के सिनेमा को दर्शकों तक पहुंचने का अवसर मिलता है।
नेशनल अवॉर्ड विजेता निर्देशक राजीव शर्मा ने मराठी सिनेमा का उदाहरण देते हुए कहा कि महाराष्ट्र में मराठी फिल्मों को सिनेमाघरों में जगह देना अनिवार्य है, जबकि पंजाब में हिंदी फिल्मों के शो चल रहे हैं, लेकिन पंजाबी फिल्में नदारद हैं। अभिनेता मलकीत रौनी ने भी इस स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि सिनेमाघरों में छह हिंदी फिल्में दिखाई जा रही हैं, तो पंजाबी फिल्म को जगह क्यों नहीं दी जा रही।
मातृभाषा के सिनेमा को मंच देने की मांग, एकजुट होने की अपील
प्रो. पाली भूपिंदर ने कहा कि पंजाबियों को जोड़ने के लिए पंजाब से जुड़े मुद्दों पर फिल्में बननी चाहिए। वहीं, नेशनल अवॉर्ड विजेता निर्देशक शरण आर्ट ने सिनेमा से जुड़े लोगों से एकजुट होकर पंजाबी फिल्मों के लिए आवाज उठाने की अपील की। लेखक-निर्देशक जस ग्रेवाल ने कहा कि मातृभाषा के सिनेमा को रोकने का अधिकार किसी दूसरे के पास नहीं है। उनके बयान में पंजाबी भाषा की फिल्मों को अपने दर्शकों तक पहुंचाने और उन्हें उचित मंच उपलब्ध कराने की मांग प्रमुख रही। लेखक-निर्देशक जगदीप वारिंग ने कहा कि सिनेमा लाखों लोगों को रोजगार देता है। ऐसे में पंजाबी फिल्मों का सिनेमाघरों से गायब होना दुर्भाग्यपूर्ण है। फिल्म निर्माण से लेकर वितरण और प्रदर्शन तक, सिनेमा से जुड़े कई लोगों की आजीविका इस उद्योग पर निर्भर करती है। ऐसे में पंजाबी फिल्मों को स्क्रीन नहीं मिलने का मुद्दा केवल भाषा और संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े कामकाज और रोजगार के अवसरों से भी जुड़ा है।
वरिष्ठ कलाकारों और पत्रकारों ने भी उठाई आवाज
वरिष्ठ अभिनेता शिविंदर महल ने मौजूदा हालात पर चिंता जताई। पत्रकार एवं लेखक दीपक चनारथल ने सिनेमा को साहित्य का दूसरा रूप बताते हुए इसकी सांस्कृतिक भूमिका की ओर ध्यान दिलाया। एसोसिएशन के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट बीएन शर्मा ने संगठन को मजबूत करने पर जोर दिया। बैठक में शामिल लोगों की मांग का केंद्र यही रहा कि पंजाबी फिल्मों को सिनेमाघरों में उचित अवसर मिलना चाहिए, ताकि स्थानीय भाषा, संस्कृति और पंजाब से जुड़े विषयों पर बनी कहानियां दर्शकों तक पहुंच सकें। हालांकि, सिनेमाघरों में पंजाबी फिल्मों के शो नहीं होने के पीछे क्या कारण हैं और इस संबंध में वितरकों या सिनेमाघर संचालकों का क्या पक्ष है, इसकी जानकारी उपलब्ध विवरण में नहीं दी गई है।
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