SIR Controversy: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों ने शनिवार को दिल्ली में एक अनूठा राजनीतिक विरोध कार्यक्रम आयोजित किया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर आयोजित मॉक पार्लियामेंट में पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने अध्यक्षता की, जबकि खड़गे ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने का प्रस्ताव पेश किया। इस कार्यक्रम में कांग्रेस समेत विपक्षी गठबंधन के 19 दलों के नेताओं के शामिल होने की जानकारी दी गई। विपक्ष ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और कथित वोट चोरी को लेकर सरकार तथा चुनाव आयोग पर सवाल उठाए।
मॉक पार्लियामेंट में मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि विपक्ष की मांग है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तत्काल पद से हटाया जाए, 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून को रद्द किया जाए और SIR की प्रक्रिया रोकी जाए। खड़गे ने आरोप लगाया कि संसद की अनुमति के बिना फॉर्म-6 में बदलाव किया गया और जानबूझकर मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए। उन्होंने कहा कि विपक्ष की लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि लोकतंत्र और नागरिकों के मतदान के अधिकार की रक्षा के लिए है। उन्होंने कहा, “वोट के अधिकार को ही हम बचा रहे हैं।” खड़गे के मुताबिक, संविधान निर्माताओं ने देश के प्रत्येक नागरिक को बराबरी का दर्जा देते हुए मतदान का अधिकार दिया था। उन्होंने भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि संविधान लागू होते ही यहां सभी वयस्क नागरिकों को वोट देने का अधिकार मिला।
खड़गे ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें मृत या अयोग्य मतदाताओं के नाम सूची में बनाए रखने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन चुनाव आयोग को नाम हटाने का आधार और संबंधित आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। उन्होंने कहा कि विपक्ष कभी यह नहीं कहता कि मृतकों के नाम मतदाता सूची में बने रहने चाहिए। उनकी मांग है कि आयोग स्पष्ट करे कि कितने मतदाता बाहर के हैं, कितने लोगों की मृत्यु हो चुकी है और किन कारणों से नाम हटाए गए हैं। खड़गे ने आरोप लगाया कि SIR के डिजाइन में ही खामियां हैं। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने इस मुद्दे पर मार्च निकाला, राष्ट्रपति से मुलाकात की और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया, लेकिन अब तक उनकी चिंताओं का संतोषजनक जवाब नहीं मिला। उनके मुताबिक, विपक्ष ने कानूनी और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने की कोशिश की, लेकिन जब उसकी सुनवाई नहीं हुई तो उसे सड़कों पर उतरना पड़ा।
महाराष्ट्र और कर्नाटक चुनावों का भी किया जिक्र
खड़गे ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का जिक्र करते हुए दावा किया कि चुनाव के दौरान करीब 40 लाख नए नाम मतदाता सूची में जोड़े गए, जिससे चुनाव परिणाम प्रभावित हुए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि SIR के दौरान इससे पांच गुना अधिक नाम हटाए गए। उन्होंने इन कथित गड़बड़ियों के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को जिम्मेदार ठहराया। हालांकि, ये खड़गे की ओर से लगाए गए राजनीतिक आरोप हैं। कांग्रेस अध्यक्ष ने कर्नाटक में भी मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाया। उन्होंने राहुल गांधी की उस प्रेस कॉन्फ्रेंस का हवाला दिया, जिसमें राहुल गांधी ने चुनावी आंकड़ों और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर सवाल उठाए थे। खड़गे ने दावा किया कि राहुल गांधी ने चुनाव आयोग से 18 बार जानकारी मांगी, लेकिन अब तक जवाब नहीं मिला। विपक्ष का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए आयोग को सभी सवालों का जवाब देना चाहिए।
मॉक पार्लियामेंट में खड़गे ने केंद्र सरकार पर सत्ता में बने रहने के लिए राजनीतिक संस्थाओं और चुनावी व्यवस्था का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। उन्होंने चुनावी बॉन्ड, सांसदों के निलंबन और कथित वोट चोरी का जिक्र करते हुए कहा कि विपक्ष के पास इन मुद्दों से जुड़े कई उदाहरण हैं। खड़गे ने दावा किया कि विपक्ष के 145 सांसदों को निलंबित करने के बाद 2023 का कानून पारित कराया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस कानून के जरिए चुनाव आयुक्तों को ऐसी सुरक्षा दी गई है, जो राष्ट्रपति को भी उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि करीब सात महीने पहले सांसदों ने दोनों सदनों में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए प्रस्ताव का नोटिस दिया था, लेकिन विपक्ष के नोटिस स्वीकार नहीं किए गए। अब मॉक पार्लियामेंट के जरिए विपक्ष एक बार फिर इस मुद्दे को जनता के सामने रख रहा है। खड़गे ने स्पष्ट किया कि उनकी ज्ञानेश कुमार से कोई निजी दुश्मनी नहीं है। उन्होंने कहा कि विपक्ष लोकतंत्र और मतदान के अधिकार की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है।
राजीव गांधी और इंदिरा गांधी का भी किया जिक्र
अपने संबोधन में खड़गे ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने संविधान संशोधन के जरिए मतदान की उम्र 21 साल से घटाकर 18 साल की थी। इससे देश के युवाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सीधे भाग लेने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि आज युवाओं के मतदान के अधिकार को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। खड़गे ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के निर्देशों पर चुनाव आयोग को चला रहे हैं। खड़गे ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के एक कथन का भी उल्लेख किया। उन्होंने इंदिरा गांधी के हवाले से कहा कि उन्होंने अपनी मृत्यु से पहले लिखा था कि वह जब तक जीवित रहेंगी, देश की सेवा करती रहेंगी और उनके खून का एक-एक कतरा भारत को मजबूत करने के लिए काम आएगा।
मॉक पार्लियामेंट की अध्यक्षता कर रहीं पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने कार्यक्रम में शामिल नेताओं का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि भारत का लोकतंत्र समानता के सिद्धांत पर आधारित है और यहां प्रत्येक वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार प्राप्त है। मीरा कुमार ने कहा कि अमीर-गरीब, महिला-पुरुष, थर्ड जेंडर या किसी भी जाति और धर्म का व्यक्ति हो, सभी को वोट देने का समान अधिकार है। लोकतंत्र में चुनाव की ताकत मतदाता से आती है और मतदाता ही पूरी व्यवस्था का केंद्र बिंदु है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें मतदान करने के योग्य लोगों के नाम कथित तौर पर अनुचित तरीके से मतदाता सूची से हटाए गए। जब INDIA ब्लॉक के नेता इस संबंध में सवाल उठाते हैं तो उन्हें चुनाव आयोग की तरफ से पारदर्शी जवाब नहीं मिलता। मीरा कुमार के मुताबिक, इसी वजह से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर यह सार्वजनिक विरोध कार्यक्रम आयोजित किया गया है।
क्या होता है पब्लिक महाभियोग?
इस कार्यक्रम को विपक्ष ने ‘पब्लिक महाभियोग’ नाम दिया है। इसमें राजनीतिक दलों के नेता मॉक पार्लियामेंट के प्रारूप में किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ अपनी शिकायतें, आरोप और मांगें सार्वजनिक रूप से रखते हैं। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि खड़गे के आवास पर आयोजित यह कार्यक्रम वास्तविक संसदीय महाभियोग की कार्यवाही नहीं है। यह विपक्ष का प्रतीकात्मक राजनीतिक विरोध है और इससे अपने आप मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का संवैधानिक फैसला नहीं होता। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में निर्धारित विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है।
भारत की संसदीय राजनीति में मॉक पार्लियामेंट के जरिए विरोध दर्ज कराने का उदाहरण पहले भी सामने आ चुका है। 20 अगस्त 2010 को लोकसभा की कार्यवाही स्थगित होने के बाद करीब 70 सांसदों ने मिलकर अपनी मॉक पार्लियामेंट आयोजित की थी। उस कार्यक्रम में लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव ने प्रधानमंत्री की भूमिका निभाई थी, जबकि भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे ने स्पीकर और कीर्ति आजाद ने नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाई थी। सांसदों ने मेडिकल काउंसिल संशोधन विधेयक को बिना चर्चा पारित किए जाने और सांसदों के वेतन के मुद्दे पर अपना विरोध दर्ज कराया था। इस बार भी विपक्ष ने मॉक पार्लियामेंट के जरिए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची से जुड़े सवालों को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने की कोशिश की है।
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