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thought of the day: ठोकरें खाकर भी न संभले तो मुसाफिर का नसीब, जानें क्यों जरूरी है जीवन में पत्थरों का फर्ज

thought of the day: ठोकरें खाकर भी न संभले तो मुसाफिर का नसीब, जानें क्यों जरूरी है जीवन में पत्थरों का फर्ज

ठोकरें तो सिर्फ आगाह करती हैं, संभलना मुसाफिर का अपना हुनर है

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GGaganpreet Kaur

thought of the day: कई बार जिंदगी के मोड़ पर जब चारों तरफ धुंध छा जाती है और आगे बढ़ने के सारे रास्ते बंद नजर आने लगते हैं, तब एक सही विचार मन की खिड़की खोलने का काम करता है। विचार की इसी ताकत के साथ आज का हमारा सुविचार इंसान को उसकी जिम्मेदारी का अहसास कराता है:

‘ठोकरें खाकर भी न संभले तो मुसाफिर का नसीब, वरना पत्थरों ने तो अपना फर्ज निभा ही दिया था।’

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यह पंक्ति सिर्फ शब्दों का जाल नहीं, बल्कि जीवन का एक बड़ा फलसफा है। यह हमें याद दिलाती है कि हमारे रास्ते में आने वाली बाधाएं दरअसल हमारे लिए एक मूक चेतावनी होती हैं। पत्थर का काम सिर्फ राह में आना है, लेकिन उस ठोकर को खाकर भी यदि इंसान अपनी चाल न बदले, तो दोष परिस्थितियों का नहीं, बल्कि खुद मुसाफिर की जिद का होता है।

गलतियों से मुंह मोड़ने के बजाय उनसे सीख लेना ही बुद्धिमानी

अक्सर देखा जाता है कि लोग अपनी नाकामियों या संकट के समय का ठीकरा दूसरों पर या अपनी किस्मत पर फोड़ देते हैं। पत्रकारिता और आम जीवन के अनुभव बताते हैं कि इतिहास खुद को तभी दोहराता है, जब हम पुरानी गलतियों से सबक नहीं लेते। रास्ते का पत्थर हमें गिराने के लिए नहीं, बल्कि यह बताने के लिए होता है कि हमारी नजरें कहीं और थीं। जिंदगी की परेशानियां भी कुछ ऐसी ही हैं; वे हमें कुछ पलों के लिए रोकती हैं ताकि हम अपनी कमियों को पहचान सकें, उन्हें सुधारें और फिर दोगुनी ताकत से अपनी मंजिल की तरफ कदम बढ़ाएं।

संघर्षों की भट्टी में तपकर ही निखरती है इंसान की असली शख्सियत

जैसे सोने की शुद्धता और उसकी चमक तब तक निखरकर सामने नहीं आती, जब तक उसे तेज आग में तपाया न जाए, ठीक यही नियम इंसानी जिंदगी पर भी लागू होता है। जिसे हम अमूमन अपना बुरा वक्त या विपत्ति मान बैठते हैं, वही वक्त हमारे भीतर छिपे धैर्य, साहस और सूझबूझ को बाहर निकालता है। जो व्यक्ति संकट के इन दौर में विचलित होने के बजाय शांत मन से परिस्थितियों को समझता है, वक्त का पहिया घूमते ही सफलता का ताज उसी के सिर सजता है। विपरीत परिस्थितियां हमारे खिलाफ नहीं, बल्कि हमें भीतर से फौलाद बनाने के लिए आती हैं।

जो रुककर संभल गया, मंजिल उसी का पता ढूंढती है

इस पूरे विचार का निचोड़ यही है कि जिंदगी हमें सुधार के अनगिनत मौके देती है। ठोकरें लगती रहेंगी क्योंकि वे सफर का हिस्सा हैं, लेकिन असली मुसाफिर वही है जो गिरने के बाद और मुस्तैदी से खड़ा होता है और अपने कदमों को संभालता है। मुश्किलों को अपने रास्ते की दीवार बनाने के बजाय उन्हें सफलता की सीढ़ी बनाना हमारी सोच पर निर्भर करता है। इसलिए, अगली बार जब भी कोई ठोकर लगे, तो पत्थरों को कोसने के बजाय अपनी दिशा और अपनी चाल को परखिए, क्योंकि कई बार वे ठोकरें ही हमें उस मुकाम तक ले जाती हैं जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

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