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Yamunanagar Boli Gold: यमुनानगर की इस नदी में बहता है सोना, जानिए कैसे रेत छानकर पेट पालते हैं सैकड़ों परिवार

Yamunanagar Boli Gold: यमुनानगर की इस नदी में बहता है सोना, जानिए कैसे रेत छानकर पेट पालते हैं सैकड़ों परिवार

यमुनानगर की इस नदी में बहता है सोना, जानिए कैसे रेत छानकर पेट पालते हैं सैकड़ों परिवार

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AAmandeep Singh

Yamunanagar Boli Gold: यमुनानगर जिले के सीमावर्ती इलाकों में बहने वाली बोली नदी इन दिनों खासी चर्चा में है। पहली नज़र में आम सी दिखने वाली यह नदी आसपास के सैकड़ों परिवारों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों से जब बरसात का पानी नीचे उतरता है, तो अपने साथ मिट्टी और रेत के अलावा सोने के बेहद महीन कण भी बहाकर लाता है।

इन्हीं कणों को दिन-रात पानी में तपस्या की तरह छानकर स्थानीय ग्रामीण अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ करते हैं। हालांकि यह काम जितना जादुई सुनने में लगता है, हकीकत में उतना ही जोखिम भरा और थका देने वाला है।

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चमक पहचानना सालों की साधना

मानकपुर गांव के रहने वाले कारीगर नरेश कुमार बताते हैं कि वे पिछले 35 सालों से यह काम कर रहे हैं और उनके परिवार की यह चौथी या पांचवीं पीढ़ी है जो बोली नदी पर निर्भर है। उनके मुताबिक, रेत में सोने के कण खोजना इतना आसान नहीं होता, क्योंकि पानी के नीचे चमकने वाली हर चीज सोना नहीं होती।

रेत और सोने के बीच का फर्क समझने में ही कारीगरों को सालों लग जाते हैं। जब बोली नदी में पानी कम होता है या काम धीमा पड़ता है, तो ये कारीगर सोम, गंगा और सतलुज जैसी दूसरी नदियों की तरफ भी रुख करते हैं।

लकड़ी की कश्ती, काला मसाला और आग की तपन

सोना निकालने की प्रक्रिया बेहद जटिल और पारंपरिक है। जब मानसून में नदी का पानी थोड़ा कम होता है, तो किनारे जमा हुई रेत और बजरी को लकड़ी की छोटी कश्तियों में डाला जाता है। एक कश्ती पर 3 से 4 लोग मिलकर काम करते हैं।

घंटों बहते पानी में रेत को लोहे की जालियों और लकड़ी के औजारों से छाना जाता है। इस कड़ी मशक्कत के बाद मुट्ठी भर काली रेत बचती है, जिसमें सोने के कण छिपे होते हैं। इसे घर लाकर एक खास मसाले के साथ तेज आग पर तपाया जाता है। आग की गर्मी से मसाला जल जाता है और शुद्ध पिघला हुआ सोना नीचे बैठ जाता है, जिसे बाद में बाजार में बेच दिया जाता है।

टेंडर व्यवस्था और जानलेवा खतरा

कारीगर संजीव कुमार के अनुसार, बरसात के तीन महीनों में सबसे बेहतर काम होता है। कभी-कभी एक दिन में डेढ़ ग्राम तक सोना मिल जाता है, तो कई बार हफ्तों खाली हाथ भी रहना पड़ता है। ठंड के मौसम में भी हाड़ कंपाने वाले पानी में उतरकर ये लोग तीन-चार रत्ती सोना निकाल ही लेते हैं।

प्रशासन की ओर से इस काम के लिए बकायदा टेंडर जारी किया जाता है। ठेकेदार बोलियां लगाकर लाइसेंस लेते हैं और फिर इन कारीगरों को काम पर रखा जाता है। औसतन एक मजदूर दिन में 1500 से 2000 रुपये तक कमा लेता है।

लेकिन पहाड़ों में अचानक आने वाला बाढ़ का पानी कई बार इनके औजार ही नहीं, जान भी ले जाता है। यही वजह है कि हाड़तोड़ मेहनत और जान के खतरे को देखते हुए अब नई पीढ़ी इस काम में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं ले रही है।

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