Hanuman Ji: हनुमान जी के जन्म का रहस्य, अप्सरा का श्राप, 12 साल की तपस्या और दशरथ के यज्ञ की खीर

हनुमान जी के जन्म का रहस्य, अप्सरा का श्राप, 12 साल की तपस्या और दशरथ के यज्ञ की खीर
Hanuman Ji: सनातन परंपरा में श्री हनुमान जी की महिमा अपार है। उन्हें शक्ति, बुद्धि, साहस और अनन्य रामभक्ति का प्रतीक माना जाता है। लेकिन भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार के रूप में हनुमान जी का जन्म केवल एक चमत्कारिक घटना नहीं थी। इसके पीछे उनकी माता अंजना का बरसों का संघर्ष, एक ऋषि का श्राप, मतंग ऋषि का मार्गदर्शन और अयोध्या में हुए पुत्रकामेष्टि यज्ञ की एक बड़ी भूमिका जुड़ी हुई है। पौराणिक ग्रंथों में दर्ज यह कथा भक्ति, समर्पण और नियति के उस सुंदर ताने-बाने को उजागर करती है, जो किसी भी भक्त के मन को श्रद्धा से भर दे।
पूर्व जन्म में अप्सरा थीं अंजना, श्राप के कारण वानर रूप में लिया जन्म
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, माता अंजना अपने पूर्व जन्म में देवराज इंद्र की सभा की परम सुंदर अप्सरा ‘पुंजिकास्थला’ थीं। एक बार उनसे अनजाने में एक ऋषि की तपस्या में विघ्न पड़ गया, जिससे क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें पृथ्वी लोक पर वानर रूप में जन्म लेने का श्राप दे दिया। जब अप्सरा ने अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी, तो ऋषि ने श्राप से मुक्ति का एक मार्ग बताया। शर्त यह थी कि जब वे एक ऐसे दिव्य बालक को जन्म देंगी, जो भगवान शिव का अंश होगा, तब उनका यह श्राप समाप्त हो जाएगा। इसके बाद पृथ्वी पर उनका जन्म हुआ और उनका विवाह वानरराज केसरी के साथ संपन्न हुआ।
ऋषि मतंग की सलाह और 12 वर्षों की कठोर शिव साधना
वैवाहिक जीवन सुखी होने के बावजूद संतान न होने की चिंता अंजना को सताने लगी, क्योंकि वही दिव्य पुत्र उन्हें श्रापमुक्त करा सकता था। अपनी इस व्यथा को लेकर वे मातंग ऋषि के आश्रम पहुंचीं। ऋषि मातंग ने उन्हें सुमेरु पर्वत पर जाकर भगवान शिव की तपस्या करने का परामर्श दिया। ऋषिवर के कहे अनुसार अंजना ने फल-फूल त्यागकर लगातार 12 वर्षों तक महादेव की कठिन साधना की। उनकी ऐसी निश्छल भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और उनके गर्भ से अवतार लेने का वरदान प्रदान किया।
राजा दशरथ के यज्ञ की खीर से जुड़ा महाबली का जन्म
हनुमान जी के प्राकट्य की एक और बेहद रोचक कथा अयोध्या के राजा दशरथ से जुड़ती है। जब राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया, तो अग्निदेव ने उन्हें दिव्य प्रसाद के रूप में खीर दी। राजा ने वह खीर अपनी रानियों में बांट दी। कथा के अनुसार, उसी खीर का एक छोटा सा भाग एक पक्षी ले उड़ा और उड़ते हुए उसने उस खीर को तपस्यारत अंजना की अंजुली (हाथों) में गिरा दिया।
पवनदेव के माध्यम से पहुंचे इस प्रसाद को अंजना ने शिव कृपा मानकर ग्रहण कर लिया। इसी के परिणामस्वरूप माता अंजना के गर्भ से महाबली हनुमान जी का जन्म हुआ और वे श्राप से मुक्त होकर पुनः अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त हुईं।
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