Haryana Water Quality: हरियाणा में ‘जहरीला’ हुआ भूजल, 88 ब्लॉकों में TDS खतरे के निशान से ऊपर, नूंह-पलवल में हालात गंभीर

हरियाणा में 'जहरीला' हुआ भूजल, 88 ब्लॉकों में TDS खतरे के निशान से ऊपर, नूंह-पलवल में हालात गंभीर
Haryana Water Quality: हरियाणा में नलों से आ रहा पानी अब केवल प्यास बुझाने का जरिया नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे लोगों की सेहत के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। राज्य में भूजल का खारापन और उसमें घुले हानिकारक तत्वों (TDS) का स्तर इस कदर बढ़ चुका है कि आधी से ज्यादा आबादी अमानक और दूषित पानी पीने को मजबूर है।
विधानसभा सत्र के दौरान कांग्रेस विधायक आदित्य सुरजेवाला द्वारा पूछे गए एक अतारांकित प्रश्न के उत्तर में जनस्वास्थ्य मंत्री रणबीर गंगवा ने जो आंकड़े सदन के पटल पर रखे, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। आंकड़ों से साफ है कि प्रदेश के 142 ब्लॉकों में से 88 में भूजल का औसतन टीडीएस (Total Dissolved Solids) 500 मिलीग्राम प्रति लीटर की सुरक्षित और स्वीकार्य सीमा से कहीं ज्यादा ऊपर निकल चुका है।
3 साल में 93 ब्लॉकों में बढ़ा खारापन, नूंह-पलवल में भयावह हालात
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, 2022 से 2025 के बीच प्रदेश के लगभग 65.5 प्रतिशत (93 ब्लॉकों) में भूजल की गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है। इस दौरान राज्य का औसत टीडीएस 658 mg/L से बढ़कर 737 mg/L तक पहुंच गया।
सबसे चिंताजनक स्थिति दक्षिण हरियाणा के जिलों की है। पलवल जिले में औसतन टीडीएस 940 से छलांग लगाकर 1,636 mg/L तक पहुंच गया है, जबकि नूंह के इंदी ब्लॉक में यह आंकड़ा 1,974 mg/L दर्ज किया गया। हद तो तब हो गई जब कुछ विशिष्ट पेयजल स्रोतों में टीडीएस 9,553 mg/L तक पाया गया—जो कि तय मानक (500 mg/L) से लगभग 19 गुना अधिक है। इतना अत्यधिक टीडीएस न केवल पानी का स्वाद कड़वा करता है, बल्कि पेट, गुर्दे (किडनी) और हड्डियों की गंभीर बीमारियों की मुख्य वजह बनता है।
नहरी नेटवर्क की नाकामी: 5 जिलों में 13 साल से कवरेज ‘जीरो’
भूजल के तेजी से खारे और दूषित होने के बावजूद सरकार वैकल्पिक स्रोतों के रूप में नहरी पेयजल (Canal-based Drinking Water) उपलब्ध कराने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है।
विधानसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक फरीदाबाद, गुरुग्राम, पलवल, पंचकूला और यमुनानगर में नहरी पानी की कवरेज पिछले 13 वर्षों (वर्ष 2014 से 2026 तक) से शून्य बनी हुई है। वहीं, मुख्यमंत्री के गृह जिले रहे करनाल में भी नहरी पेयजल की पहुंच महज 1.90 प्रतिशत के आसपास ही सिमटी हुई है। नतीजा यह है कि इन इलाकों की विशाल आबादी पूरी तरह से भूजल पर ही निर्भर रहने को विवश है।
दूषित पानी की शिकायतों में 7 गुना उछाल, ‘श्वेत पत्र’ की मांग
जमीनी स्तर पर पेयजल संकट की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जनस्वास्थ्य विभाग के पास दूषित पानी मिलने की शिकायतें साल-दर-साल तेजी से बढ़ी हैं। वर्ष 2019 में जहां दूषित पेयजल से जुड़ी केवल 1,356 शिकायतें आई थीं, वहीं 2025 तक यह आंकड़ा 7.2 गुना बढ़कर 9,769 पर पहुंच गया। वर्ष 2026 में भी अब तक 6,600 से अधिक शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं।
इन आंकड़ों को आधार बनाते हुए विधायक आदित्य सुरजेवाला ने सरकार को घेरते हुए 2014 से अब तक की सभी नहर आधारित पेयजल योजनाओं पर ‘श्वेत पत्र’ (White Paper) जारी करने की मांग की है। सुरजेवाला का कहना है कि 1,000 टीडीएस से अधिक वाले सभी जल स्रोतों में फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट और हेवी मेटल्स की जांच कराकर रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए।
विधानसभा में उठी इस बहस ने साफ कर दिया है कि अगर हरियाणा सरकार ने भूजल संरक्षण और नहरी पानी के विस्तार के लिए तत्काल ठोस नीति नहीं बनाई, तो आने वाले दिनों में यह जल संकट एक बड़े जन-स्वास्थ्य आपातकाल (Public Health Crisis) का रूप ले सकता है।
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