Brij Bhushan Sharan Singh Case: महिला पहलवानों से जुड़े बहुचर्चित यौन उत्पीड़न मामले में शुक्रवार को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। भारतीय कुश्ती संघ (WFI) के पूर्व अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह और WFI के पूर्व सचिव विनोद तोमर को निचली कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर यह सुनवाई चल रही है। शुक्रवार को हुई कार्यवाही के दौरान दोनों आरोपी अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश हुए, लेकिन इस दौरान किसी भी पक्ष की ओर से लिखित जवाब दाखिल नहीं किया जा सका।
दिल्ली पुलिस और वकीलों ने मांगा अतिरिक्त समय
सुनवाई के दौरान एमपी/एमएलए सेशन कोर्ट के जज दिग्विनय सिंह ने दिल्ली पुलिस से स्पष्ट सवाल किया कि क्या वह इस अपील पर अपना पक्ष रखना चाहती है। इस पर पुलिस अधिकारियों की ओर से अदालत को बताया गया कि जवाब दाखिल करने से पहले उच्च स्तर और आंतरिक विभागों के साथ चर्चा करना आवश्यक है। पुलिस ने इसके लिए कुछ समय की मांग की, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। वहीं, बृजभूषण शरण सिंह की तरफ से पेश हुए अधिवक्ता ऋषभ भाटी ने भी अदालत को बताया कि नोटिस के जवाब में उनका पक्ष जल्द ही रिकॉर्ड पर रखा जाएगा। कोर्ट ने सभी पक्षों को 28 अक्टूबर से पहले अपना लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
निचली कोर्ट के रिकॉर्ड की मिलेगी डिजिटल कॉपी
मामले की पारदर्शिता और सुचारू सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए कोर्ट ने अहम निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने निचली कोर्ट में शुरुआती जांच से लेकर बरी करने के फैसले तक चली पूरी प्रक्रिया की डिजिटल कॉपी तैयार करने को कहा है। यह डिजिटल रिकॉर्ड पेन ड्राइव के माध्यम से महिला पहलवानों, आरोपी पक्ष और दिल्ली पुलिस को उपलब्ध कराया जाएगा। आगामी 28 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई के बाद इस अपील पर विस्तृत बहस शुरू होने की तारीख तय की जाएगी, जिससे मामले में आगे की कानूनी दिशा स्पष्ट होगी।
क्या था निचली कोर्ट का फैसला और अपील के मुख्य बिंदु
गौरतलब है कि दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने गत 3 अगस्त को इस मामले में बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर को बरी कर दिया था। उस दौरान अदालत ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास, लंबे समय तक शिकायत दर्ज न कराने और आरोपियों के साथ सामान्य संबंध बने रहने जैसे तर्कों का हवाला दिया था। इस फैसले के खिलाफ महिला पहलवानों ने ऊपरी अदालत का रुख किया है। अपील में आरोप लगाया गया है कि निचली कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही ढंग से मूल्यांकन नहीं किया और फैसले में रूढ़िवादी धारणाओं का सहारा लिया गया। पहलवानों का तर्क है कि डरावने माहौल और करियर की चिंता के चलते खुलकर सामने आने में समय लगा, जिसे उनके खिलाफ आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
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