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Ladwa News: लाडवा के हिंदू हाई स्कूल में जुटी शिक्षकों की टोली, CBSE ने सिखाए क्लासरूम को जेंडर-सेंसिटिव बनाने के गुर

Ladwa News: लाडवा के हिंदू हाई स्कूल में जुटी शिक्षकों की टोली, CBSE ने सिखाए क्लासरूम को जेंडर-सेंसिटिव बनाने के गुर

लाडवा के हिंदू हाई स्कूल में जुटी शिक्षकों की टोली

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GGaganpreet Kaurकंटेंट क्रेडिट: लाडवा, कैलाश गोयल

Ladwa News: एक संवेदनशील, सुरक्षित और समानता पर आधारित समाज की नींव रखने की शुरुआत क्लासरूम के भीतर से ही होती है। इसी सोच को धरातल पर उतारने के लिए लाडवा स्थित हिंदू हाई स्कूल में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के तत्वावधान में “जेंडर सेंसिटिविटी” (लैंगिक संवेदनशीलता) विषय पर एक विशेष क्षमता निर्माण कार्यक्रम (सीबीपी) का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में शिक्षा क्षेत्र के जानकारों ने इस बात पर गहराई से मंथन किया कि कैसे एक शिक्षक बच्चों के मन से लैंगिक भेदभाव को मिटाकर उन्हें एक बेहतर नागरिक बना सकता है।

स्कूल की चारदीवारी के भीतर मिले बराबरी का आसमान

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कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्यों को रेखांकित करते हुए स्कूल प्रबंधक समिति के प्रधान पवन गर्ग ने कहा कि वर्तमान दौर में केवल किताबी ज्ञान देना ही काफी नहीं है। विद्यालयों में एक ऐसा समावेशी (Inclusive) और सुरक्षित शैक्षिक माहौल तैयार करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है, जहां हर छात्र और छात्रा खुद को सुरक्षित और सम्मानित महसूस कर सके।

इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए स्कूल की प्रधानाचार्या योगिता अहलूवालिया ने बाहर से आए सभी रिसोर्स पर्सन्स और शिक्षक-प्रतिभागियों का गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने बेहद संजीदा लहजे में कहा, “शिक्षक केवल सिलेबस पूरा कराने का जरिया नहीं हैं, बल्कि वे समाज के भविष्य का खाका खींचते हैं। बच्चों में समानता, सम्मान और संवेदनशीलता जैसे बुनियादी मानवीय मूल्यों को बोना हर शिक्षक का नैतिक और व्यावसायिक दायित्व है।” उन्होंने उम्मीद जताई कि इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम शिक्षकों के खुद के व्यावसायिक विकास और उनकी सोच को व्यापक बनाने में मील का पत्थर साबित होते हैं।

किताबों से आगे की बात: खेल-खेल में सीखीं बारीकियां

कार्यशाला को जीवंत और प्रभावी बनाने का जिम्मा संभाला था अनुभवी रिसोर्स पर्सन दीपिंदर वालिया और मीनू रानी ने। उन्होंने जेंडर और सेक्स के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए लैंगिक संवेदनशीलता, समान अवसर, समाज में व्याप्त रूढ़िवादी सोच (Stereotypes) से मुक्ति और समावेशी शिक्षा जैसे गंभीर विषयों पर बेहद सरल भाषा में बात की। सत्र को उबाऊ लेक्चर बनाने के बजाय विशेषज्ञों ने विभिन्न व्यावहारिक गतिविधियों, रोल-प्ले, केस स्टडीज और समूह चर्चाओं का सहारा लिया। इससे शिक्षकों को यह समझने में आसानी हुई कि अनजाने में भी क्लासरूम के भीतर लड़कों और लड़कियों के बीच किसी तरह का भेदभाव न होने पाए।

इस कार्यशाला में लाडवा और आसपास के विभिन्न स्कूलों से आए शिक्षकों ने न केवल बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, बल्कि बच्चों को पढ़ाते समय आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों और अपने अनुभवों को भी साझा किया। ट्रेनिंग के अंत में शिक्षकों ने माना कि यह सत्र उनके लिए आंखें खोलने वाला रहा और उन्होंने यहां सीखी बातों को अपने स्कूलों में ईमानदारी से लागू करने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के समापन पर प्रधानाचार्या योगिता अहलूवालिया ने रिसोर्स पर्सन्स और सीबीएसई (CBSE) प्रशासन का आभार जताते हुए कहा कि मूल्यपरक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए ऐसे आयोजन भविष्य में भी जारी रहेंगे।

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