LPU Violence Case: पंजाब के फगवाड़ा स्थित लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) में सितंबर 2026 के दौरान हुई हिंसा के मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सोमवार को पंजाब सरकार की जांच पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत में मामला उस सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा था, जिसमें दो लड़कियों के यौन शोषण और हत्या का दावा किया गया था। इस पोस्ट को शेयर करने वाली 18 वर्षीय छात्रा की भूमिका और उसके बयान को लेकर सुनवाई के दौरान कई सवाल उठे। चीफ जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की डिवीजन बेंच ने कहा कि पुलिस को छात्रा से उचित तरीके से पूछताछ करनी चाहिए। जांच में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि उसने जानबूझकर भ्रामक संदेश आगे भेजा था या किसी दूसरे व्यक्ति ने उसके मोबाइल का इस्तेमाल करके पोस्ट फैलाई। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि गंभीर आरोपों वाला संदेश सबसे पहले किसने तैयार किया और उसे फैलाने के पीछे कौन लोग थे।
सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार की ओर से बताया गया कि छात्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से संदेश आगे शेयर किया था, लेकिन उसका कोई आपराधिक इरादा नहीं था। पुलिस ने छात्रा के बयान से संबंधित रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत के सामने पेश की। हालांकि, जब बेंच ने लिफाफे की जांच की तो उसमें छात्रा का बयान मौजूद नहीं था। इस पर अदालत ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई और मामले की जांच को गंभीरता से लेने के निर्देश दिए। इसके बाद केस को लंच के बाद दोबारा सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया। अदालत का मुख्य सवाल यह है कि केवल पोस्ट शेयर करने वाले व्यक्ति की भूमिका की जांच करना पर्याप्त है या नहीं। पुलिस को यह भी पता लगाना होगा कि संदेश का मूल स्रोत क्या था, उसे किसने तैयार किया और उसे अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंचाने में किन लोगों की भूमिका रही।
फर्जी पोस्ट से भड़की हिंसा, 30 करोड़ रुपये के नुकसान का दावा
LPU में हिंसा के दौरान कैंपस में तोड़फोड़, आगजनी और पुलिस के साथ टकराव की घटनाएं हुई थीं। याचिकाकर्ता छात्र की ओर से पेश वकील ने हाईकोर्ट को बताया कि इन घटनाओं में पुलिसकर्मी भी घायल हुए और करीब 30 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। यह आंकड़ा याचिकाकर्ता की ओर से किया गया दावा है। हाईकोर्ट ने 8 अक्टूबर की पिछली सुनवाई में भी सोशल मीडिया पर ऐसी घटना की झूठी जानकारी फैलाने को लेकर चिंता जताई थी, जो वास्तव में हुई ही नहीं हो। अदालत ने कहा था कि इस तरह की पोस्ट कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। यदि हजारों छात्रों को किसी गंभीर अपराध की जानकारी मिलती है और वे उसे सच मानकर सड़कों पर उतर आते हैं, तो हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं।
पिछली सुनवाई में बेंच ने यह सवाल भी उठाया था कि भ्रामक संदेश शेयर करने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की भूमिका की जांच कैसे की जानी चाहिए। अदालत इस पहलू पर भी विचार कर रही है कि ऐसे मामलों में झूठी जानकारी के स्रोत और उसे प्रसारित करने वालों की पहचान के लिए क्या व्यवस्था होनी चाहिए। चीफ जस्टिस ने अभिव्यक्ति की आजादी और जानबूझकर झूठ फैलाने के बीच अंतर पर भी जोर दिया था। अदालत के अनुसार, संविधान नागरिकों को अपनी राय रखने और आलोचना करने का अधिकार देता है, लेकिन सार्वजनिक भावनाएं भड़काने के उद्देश्य से जानबूझकर गलत जानकारी फैलाने को उसी अधिकार के बराबर नहीं माना जा सकता।
चितकारा यूनिवर्सिटी की घटना के अगले दिन फैली थी पोस्ट
पंजाब सरकार के अनुसार, 25 सितंबर को एक छात्रा की आत्महत्या के बाद चितकारा यूनिवर्सिटी में स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी। इसके अगले दिन सोशल मीडिया पर यह झूठी जानकारी फैलने लगी कि LPU में एक पुरुष कर्मचारी ने छात्रा के साथ रेप किया है। याचिकाकर्ता ने दोनों घटनाओं के बीच संबंध होने का दावा किया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि दोनों घटनाओं को अलग-अलग पहलुओं से देखना जरूरी है। अदालत ने राज्य सरकार से यह पता लगाने को भी कहा था कि क्या दोनों घटनाओं को लेकर सोशल मीडिया पर जानकारी फैलाने के लिए एक ही प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल हुआ था। जांच में यह स्पष्ट होना अहम है कि संदेश कहां से शुरू हुआ और किस तरह बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचा।
पंजाब सरकार ने अदालत को बताया कि इस मामले में अब तक नौ लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें दो बाहरी लोग भी शामिल हैं, जिन्हें एक पिज्जा डिलीवरी कंपनी का कर्मचारी बताया गया है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन ने LPU कैंपस में बाहरी लोगों के प्रवेश से जुड़े आरोपों का भी जिक्र किया। हाईकोर्ट ने पंजाब की सीमावर्ती राज्य के रूप में स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर भ्रामक जानकारी के जरिए बड़े स्तर पर अशांति फैलने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत के सामने यह सवाल भी है कि अगर किसी प्लेटफॉर्म पर फैली गलत जानकारी से हिंसा होती है और जान-माल का नुकसान होता है, तो संबंधित प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करने के लिए क्या प्रक्रिया होनी चाहिए।
21 सितंबर से शुरू हुई अफवाह, 27 सितंबर को उग्र हुआ प्रदर्शन
पुलिस जांच के अनुसार, मुख्य हिंसा से करीब पांच दिन पहले यानी 21-22 सितंबर को गर्ल्स हॉस्टल से Reddit और दूसरे चैट ग्रुप्स पर एक पोस्ट डाली गई थी। इसमें दावा किया गया था कि हॉस्टल नंबर-3 में एक बाहरी प्लंबर ने छात्रा के साथ रेप किया है। इस दावे की पुष्टि नहीं हुई थी। 26 सितंबर को यह संदेश वॉट्सऐप ग्रुप्स और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तेजी से फैल गया। न्याय की मांग करते हुए शनिवार देर रात करीब डेढ़ से पौने दो बजे हजारों छात्र-छात्राएं हॉस्टलों से बाहर निकल आए और यूनिवर्सिटी के मुख्य गेट की तरफ बढ़ने लगे। 27 सितंबर को प्रदर्शन उग्र हो गया। पुलिस जांच के विवरण के अनुसार, कुछ नकाबपोश बाहरी असामाजिक तत्वों और छात्रों ने कैंपस में यूरी मॉल, एटीएम और बायोमेट्रिक गेटों पर तोड़फोड़ की और आग लगा दी। प्रदर्शनकारियों ने जालंधर-फगवाड़ा नेशनल हाईवे जाम कर दिया, जिससे यातायात करीब 18 घंटे तक बाधित रहा।
स्थिति संभालने पहुंची पुलिस पर पथराव हुआ, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। भीड़ ने पुलिस की गाड़ियों को भी आग के हवाले कर दिया। इसके बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया। तनाव के बीच कुछ छात्रों की शिकायत पर पुलिस ने अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ रेप का मामला भी दर्ज किया था, ताकि आरोपों की जांच की जा सके। 28 सितंबर को LPU प्रशासन ने आरोपों को खारिज करते हुए इसे यूनिवर्सिटी को बदनाम करने की साजिश बताया। सुरक्षा कारणों से यूनिवर्सिटी को 10 दिनों के लिए बंद कर दिया गया और मिड-टर्म परीक्षाएं स्थगित कर दी गईं। हजारों छात्र डर और छुट्टियों के कारण रात में ही कैंपस छोड़कर घर लौटने लगे। इलाके में भारी पुलिस बल तैनात किया गया और हाईवे को खाली कराया गया। इसी दौरान कुछ वीडियो सामने आए, जिनमें छात्रों ने आरोप लगाया कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने उनसे जबरन स्पष्टीकरण वाले बयान रिकॉर्ड करवाए। ये आरोप भी मामले से जुड़े विवाद का हिस्सा बने रहे।
दो SIT गठित, तीन मुख्य आरोपियों को पुलिस रिमांड पर भेजा गया
मामले की गंभीरता को देखते हुए 29-30 सितंबर को पंजाब पुलिस ने जांच के लिए दो विशेष जांच टीमें (SIT) गठित कीं। इसी दौरान मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा। अदालत ने पंजाब सरकार से हिंसा और उसके बाद की गई कार्रवाई पर विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट मांगी। 1-2 अक्टूबर को पुलिस ने डिजिटल सबूतों और CCTV फुटेज की जांच के बाद हिंसा और तोड़फोड़ के आरोप में तीन मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार किया। अदालत ने उन्हें तीन दिन की पुलिस कस्टडी में भेजा था। अब हाईकोर्ट की निगरानी में जांच के कई पहलू अहम बने हुए हैं। इनमें 18 वर्षीय छात्रा की वास्तविक भूमिका, उसके मोबाइल फोन के इस्तेमाल, भ्रामक पोस्ट के मूल स्रोत, संदेश को फैलाने वाले लोगों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की संभावित जवाबदेही से जुड़े सवाल शामिल हैं। अदालत की नाराजगी के बाद पंजाब सरकार और पुलिस के सामने जांच के तथ्यों को स्पष्ट रूप से पेश करने की चुनौती है। LPU हिंसा केस में बड़ी कार्रवाई, मिग फाइटर जेट पर चढ़ने वाला छात्र हिमाचल से गिरफ्तार, 9 लोग दबोचे गए

