Mahendragarh News: हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय (हकेंवि) के पोषण जीवविज्ञान विभाग द्वारा ‘विश्व खाद्य दिवस 2026’ के अवसर पर एक दिवसीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का मुख्य विषय ‘प्रोबायोटिक्स एवं किण्वित खाद्य पदार्थ: आंतों के स्वास्थ्य, पोषण सुरक्षा और सतत खाद्य प्रणालियों का संवर्धन’ था। यह पूरा कार्यक्रम विश्व खाद्य दिवस 2026 की निर्धारित थीम ‘आज नवाचार, कल पोषण’ के अनुरूप आयोजित किया गया।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पोषण, जनस्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी समकालीन चुनौतियों के समाधान में वैज्ञानिक नवाचार, पारंपरिक खाद्य पद्धतियों और सतत खाद्य प्रौद्योगिकियों की महत्वपूर्ण भूमिका पर गहन चर्चा करना था। यह संगोष्ठी विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. टंकेशवर कुमार और समकुलपति प्रो. पवन कुमार शर्मा के कुशल मार्गदर्शन और सहयोग से संपन्न हुई।
विशेषज्ञों के विशेष व्याख्यान
संगोष्ठी के दौरान देश के जाने-माने विशेषज्ञों ने अपने विचार और शोध साझा किए:
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प्रो. अशोक कुमार यादव (प्राणी विज्ञान विभाग, केंद्रीय विश्वविद्यालय, जम्मू): उन्होंने ‘कार्यात्मक खाद्य पदार्थों एवं स्वास्थ्यवर्धक न्यूट्रास्यूटिकल्स के विकास के लिए देशज प्रोबायोटिक लैक्टोबैसिलस उपभेदों की संभावनाओं की खोज’ विषय पर सारगर्भित व्याख्यान दिया। उन्होंने लाभकारी सूक्ष्मजीवों के उपयोग तथा कार्यात्मक खाद्य पदार्थों के विकास में इनकी संभावनाओं पर प्रकाश डाला।
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डॉ. सुब्रत हाती (एसएमसी कॉलेज ऑफ डेयरी साइंस, कामधेनु विश्वविद्यालय, गुजरात) उन्होंने ‘दुग्ध किण्वन तथा दुग्ध प्रोटीन से जैवसक्रिय पेप्टाइड्स के उत्पादन में लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया की भूमिका’ विषय पर अपने विचार रखे और दुग्ध किण्वन की प्रक्रिया से प्राप्त होने वाले जैवसक्रिय घटकों की उपयोगिता समझाई।
कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ प्रो. कांति प्रकाश शर्मा के स्वागत संबोधन के साथ हुआ। उन्होंने विश्व खाद्य दिवस की थीम पर प्रकाश डालते हुए पोषण सुरक्षा और सतत खाद्य प्रणालियों के महत्व को रेखांकित किया। इस दौरान पोषण जीवविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार तथा अंतर्विषयी एवं अनुप्रयुक्त विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता प्रो. पवन कुमार मौर्य के अकादमिक नेतृत्व व प्रोत्साहन के प्रति भी आभार व्यक्त किया गया।
कार्यक्रम के दौरान इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि प्रोबायोटिक्स और किण्वित खाद्य पदार्थों के माध्यम से आंतों के स्वास्थ्य को कैसे बेहतर किया जा सकता है। साथ ही, वैज्ञानिक अनुसंधान और पारंपरिक खाद्य ज्ञान के समन्वय को एक स्वस्थ समाज के निर्माण की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण बताया गया। संगोष्ठी का समापन इसी संदेश के साथ हुआ कि भविष्य में स्वस्थ समुदायों और सतत खाद्य प्रणालियों के निर्माण में यह नवाचार मील का पत्थर साबित होंगे।
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