Yamunanagar News: 16 साल से केवल कागजी दावे? पहली बारिश में ही तालाब क्यों बन जाता है यमुनानगर, अफसरों के पास जवाब नहीं
मानसून आते ही बंधक बनने वाले यमुनानगर की जनता का फूटा गुस्सा
Yamunanagar News: यमुनानगर को नगर निगम का दर्जा मिले करीब 16 साल का लंबा वक्त गुजर चुका है। इन डेढ़ दशकों में कागजों पर न जाने कितनी योजनाएं बनीं, करोड़ों रुपये के बजट पास हुए और ड्रेनेज को सुधारने के लंबे-चौड़े रोडमैप तैयार किए गए। लेकिन जमीनी हकीकत आज भी हर मानसून में शहरवासियों को मुंह चिढ़ाती नजर आती है। आसमान में बादल छाते ही यमुनानगर के बाशिंदों के जेहन में सुकून के बजाय खौफ तैरने लगता है। पहली मूसलाधार बारिश होते ही झंडा चौक, शक्ति नगर, लाजपत नगर, बर्तन बाजार और प्रोफेसर कॉलोनी जैसी मुख्य सड़कें और वीआईपी इलाके तालाब का रूप अख्तियार कर लेते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर जनता के टैक्स का करोड़ों रुपया बह जाने के बाद भी शहर को इस नारकीय स्थिति से स्थायी मुक्ति क्यों नहीं मिल सकी?
मानसून किक-स्टार्ट बनाम बारहमासी सुस्ती: जनता पूछ रही तीखे सवाल
प्रशासनिक लापरवाही का आलम यह है कि पूरे साल नालों और सीवरेज की सुध नहीं ली जाती। प्रोफेसर कॉलोनी के निवासी संदीप इस अव्यवस्था पर सीधा प्रहार करते हुए कहते हैं, “हर साल मानसून की आहट होते ही नगर निगम अचानक नींद से जागता है। नालों से गाद निकालने के विशेष अभियानों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर चमकाए जाते हैं। लेकिन अगर यह सफाई व्यवस्था पूरे साल एक तय टाइमटेबल के तहत नियमित रूप से चले, तो ऐन बरसात से पहले इस तरह की हड़बड़ी और नौटंकी करने की जरूरत ही क्यों पड़े?” स्थानीय लोगों का मानना है कि मानसून पूर्व की यह कवायद केवल बजट खपाने और खानापूर्ति करने का जरिया बनकर रह गई है, जिसका नतीजा पहली बारिश में ही सड़कों पर तैरती गंदगी के रूप में सामने आ जाता है।
फाइलों में दफन ‘अमृत योजना’: रेलवे लाइन के पार क्यों थमी रफ्तार?
शहर की बदहाल जल निकासी प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के सहयोग से करोड़ों रुपये की ‘अमृत योजना’ लागू की गई थी। दावा था कि यह योजना यमुनानगर के लिए जीवनदायिनी साबित होगी, लेकिन आज यह खुद कई गंभीर सवालों के घेरे में है। इस महत्वकांक्षी योजना की रूपरेखा पर उंगली उठाते हुए प्रबुद्ध नागरिक पूछते हैं कि अगर इस ड्रेनेज प्रोजेक्ट का खाका मुकम्मल था, तो इसकी पाइपलाइनें और ड्रेनेज नेटवर्क रेलवे लाइन के पार के इलाकों में क्यों नहीं पहुंच पाया? क्या यह किसी तकनीकी खामी का नतीजा है, या फिर विभिन्न सरकारी विभागों के बीच आपसी तालमेल और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की भारी कमी है?
जनप्रतिनिधियों के दौरों की रस्म अदायगी, पर जवाबदेही तय करेगा कौन?
बरसात के दिनों में जलभराव वाले इलाकों में वीआईपी गाड़ियों के काफिले और छाता ताने अफसरों व नेताओं की तस्वीरें बेहद आम हैं। मेयर से लेकर निगम के आला अधिकारी और स्थानीय विधायक-सांसद सड़कों पर उतरकर जल्द राहत देने का आश्वासन देते हैं। लेकिन, राज सिंह जैसे जागरूक नागरिकों का दर्द है कि ये दौरे महज एक सालाना रस्म अदायगी बनकर रह गए हैं। वे कहते हैं, “समस्या का स्थायी समाधान न होने के लिए सिर्फ निगम के बाबू ही दोषी नहीं हैं। जनता द्वारा चुने गए सांसद, विधायक और पार्षदों की भी उतनी ही नैतिक जिम्मेदारी बनती है। आखिर इन जनप्रतिनिधियों ने इस गंभीर मुद्दे को चंडीगढ़ और दिल्ली के गलियारों में कितनी मजबूती से उठाया? आज तक इस नाकामी के लिए किसी एक भी जिम्मेदार अधिकारी पर गाज क्यों नहीं गिरी?”
खतरे की घंटी: बिना ड्रेनेज मास्टर प्लान के कंक्रीट का जंगल बनता शहर
बर्तन बाजार के व्यापारी विपुल ने इस समस्या के सामाजिक और आर्थिक पहलू को उजागर करते हुए बताया कि पानी भरने से सबसे ज्यादा चोट आम आदमी की जेब और सेहत पर पड़ती है। बदबूदार और दूषित पानी के बीच से होकर छोटे-छोटे स्कूली बच्चों और बुजुर्गों को गुजरना पड़ता है, जिससे संक्रामक बीमारियों और हादसों का खतरा हर वक्त सिर पर मंडराता रहता है। व्यापारिक गतिविधियां कई दिनों तक ठप पड़ जाती हैं। सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि हर साल शहर के बाहरी हिस्सों में कट रही नई कॉलोनियां भी अब जलभराव की चपेट में आ रही हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि यमुनानगर का विस्तार बिना किसी वैज्ञानिक ड्रेनेज मास्टर प्लान के, बिल्डरों और भू-माफियाओं के रहमोकरम पर हो रहा है। यदि इस अनियंत्रित कंक्रीट के जंगल को ड्रेनेज सिस्टम से नहीं जोड़ा गया, तो आने वाले दिनों में यह संकट और विकराल हो जाएगा।
अब वक्त खोखले वादों, हवाई निरीक्षणों और आश्वासनों की चादर ओढ़ने का नहीं है। यमुनानगर को आज एक दीर्घकालिक, वैज्ञानिक और मुकम्मल ड्रेनेज मास्टर प्लान की जरूरत है, जिसमें नालों की वर्षभर नियमित सफाई और कड़े प्रशासनिक ऑडिट की व्यवस्था हो। जब तक जवाबदेही तय करने का एक पारदर्शी सिस्टम नहीं बनेगा, तब तक हर मानसून में यमुनानगर के नागरिक इसी तरह डूबते रहेंगे और हुक्मरानों से वही पुराने अनुत्तरित सवाल पूछते रहेंगे।
बॉक्स: जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारियों की बेरुखी
इस पूरे मामले और ड्रेनेज सिस्टम की विफलता को लेकर जब न्यूज़ टीम ने सीधे तौर पर शहर के प्रथम नागरिक यानी मेयर से उनका आधिकारिक पक्ष जानने का प्रयास किया, तो बताया गया कि वह शहर से बाहर हैं और उनसे संपर्क नहीं हो सका। वहीं, प्रशासनिक मुखिया यानी नगर निगम आयुक्त (कमिश्नर) के सरकारी नंबर पर भी कई बार फोन मिलाया गया, लेकिन अवकाश (छुट्टी) पर होने का हवाला देते हुए उन्होंने भी कॉल रिसीव करना मुनासिब नहीं समझा। अधिकारियों का यह रवैया खुद बयां करता है कि जनता की समस्याओं को लेकर सिस्टम कितना संवेदनशील है।
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