Chicken vs Mutton in monsoon: बारिश में चिकन खाएं या मटन? जानिए इस मौसम में कौन सा नॉन-वेज है पेट के लिए हल्का
बारिश में चिकन खाएं या मटन?
Chicken vs Mutton in monsoon: रिमझिम बारिश का मौसम जहां मिजाज को खुशनुमा बना देता है, वहीं हमारी सेहत और खासकर पाचन तंत्र के लिए कड़ी परीक्षा का समय भी होता है। इस मौसम में हवा में बढ़ती नमी अपने साथ कई तरह के बैक्टीरियल और फंगल इन्फेक्शन लेकर आती है, जिसके चलते खान-पान में थोड़ी सी भी लापरवाही सीधे पेट को बीमार कर सकती है। ऐसे में मांसाहारी (नॉन-वेजिटेरियन) भोजन के शौकीनों के सामने अक्सर यह बड़ा सवाल खड़ा होता है कि मानसून के इन दिनों में थाली में चिकन को जगह दी जाए या मटन को। हालांकि, दोनों ही चीजें प्रोटीन का पावरहाउस मानी जाती हैं,
लेकिन जब बात कैलोरी, सैचुरेटेड फैट, न्यूट्रिशन और सबसे महत्वपूर्ण—पचने की क्षमता की आती है, तो दोनों की तासीर और गुण पूरी तरह बदल जाते हैं। आइए, डाइट और हेल्थ एक्सपर्ट्स के नजरिए से समझते हैं कि इस बदलते मौसम में आपके शरीर के लिए कौन सा सौदा ज्यादा फायदेमंद रहेगा।
कम फैट और आसान पाचन: मानसून में क्यों बढ़ जाती है चिकन की डिमांड?
अगर आप बारिश के इस सुस्त मौसम में ऐसा खाना तलाश रहे हैं जो आपकी जीभ को स्वाद भी दे और पेट पर भारी भी न पड़े, तो बिना स्किन (स्किनलेस) वाला चिकन एक आदर्श विकल्प साबित हो सकता है। हेल्थ एक्सपर्ट्स बताते हैं कि मटन यानी रेड मीट के मुकाबले चिकन को पचाना हमारे पाचन तंत्र के लिए काफी सुगम होता है। इसमें उच्च गुणवत्ता वाला लीन प्रोटीन पाया जाता है, जो मानसून में सुस्त पड़ी मांसपेशियों की मरम्मत करने और शारीरिक क्षमता को बनाए रखने में मदद करता है।
इसके अलावा, चिकन में कैलोरी की मात्रा काफी कम होती है, जिसके चलते जो लोग फिटनेस फ्रीक हैं या वजन को बढ़ने से रोकना चाहते हैं, उनके लिए यह एक सुरक्षित और सेहतमंद रास्ता है।
मटन के न्यूट्रिशन में दम, लेकिन भारी फैट बढ़ा सकता है मुश्किल
दूसरी तरफ, मटन पोषक तत्वों का एक बेहद समृद्ध खजाना है। इसमें भरपूर मात्रा में ऑर्गेनिक आयरन, जिंक और विटामिन B12 जैसे माइक्रो-न्यूट्रिएंट्स पाए जाते हैं, जो शरीर में रेड ब्लड सेल्स (लाल रक्त कोशिकाओं) के निर्माण और रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को फौलादी बनाने के लिए अनिवार्य हैं। लेकिन मानसून के लिहाज से मटन का एक कमजोर पहलू भी है।
चिकन के मुकाबले मटन में सैचुरेटेड फैट और हैवी कैलोरी की मात्रा काफी ज्यादा होती है। चूंकि बारिश के दिनों में शारीरिक गतिविधियां थोड़ी कम हो जाती हैं और हमारा मेटाबॉलिज्म सुस्त पड़ जाता है, इसलिए भारी मटन को पचाना पेट के लिए मशक्कत भरा काम हो जाता है। खासकर हाई कोलेस्ट्रॉल, यूरिक एसिड या दिल की बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को इस मौसम में मटन से दूरी बनाने या बेहद सीमित मात्रा में ही इसका सेवन करने की हिदायत दी जाती है।
सेहत से समझौता नहीं: मीट खरीदते और पकाते समय बरतें ये सावधानियां
विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून में असली खतरा इस बात से नहीं है कि आप चिकन खा रहे हैं या मटन, बल्कि इस बात से है कि वह कितना ताजा और साफ है। बारिश के मौसम में मांस हमेशा किसी साफ और भरोसेमंद दुकान से ही खरीदें। सबसे जरूरी बात यह है कि मीट को कभी भी आधा पका या ‘रेयर कुक्ड’ न खाएं; इसे पूरी तरह अच्छी आंच पर (वेल-डन) पकाना बेहद जरूरी है ताकि इसके भीतर मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया पूरी तरह नष्ट हो जाएं। बासी या फ्रिज में लंबे समय से रखे मांस को खाने से बचें, क्योंकि इस मौसम में फूड पॉइजनिंग का खतरा सबसे ज्यादा होता है।
लब्बोलुआब यह है कि ताकत किसी जादुई थाली से नहीं, बल्कि एक संतुलित रूटीन से आती है। अगर आपका मुख्य मकसद कम कैलोरी में बेहतरीन प्रोटीन पाना है, तो चिकन आपकी पहली पसंद होना चाहिए। वहीं, अगर शरीर में खून की कमी है और आप विटामिंस बूस्ट करना चाहते हैं, तो हफ्ते-दस दिन में एक बार अच्छे से पका हुआ मटन कम मात्रा में खाया जा सकता है।
