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Somaliland Money Market: यहां बोरे में नोट भरकर सब्जी खरीदने जाते हैं लोग, सोमालीलैंड के ‘नोटों के बाजार’ की हैरान करने वाली कहानी

Somaliland Money Market: यहां बोरे में नोट भरकर सब्जी खरीदने जाते हैं लोग, सोमालीलैंड के 'नोटों के बाजार' की हैरान करने वाली कहानी

सोमालिया से अलग होकर भी वजूद की लड़ाई लड़ रहा सोमालीलैंड, जहां ट्रक में लादकर ले जाना पड़ता है सामान का भुगतान

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AAmandeep Singh

Somaliland Money Market: आज वैश्विक स्तर पर भारत का यूपीआई (UPI) डिजिटल लेन-देन की एक मिसाल बन चुका है, जिसने नकदी पर हमारी निर्भरता को बेहद कम कर दिया है। लेकिन अफ्रीका के एक कोने में एक ऐसा क्षेत्र भी है, जहां लोग शौक से नहीं बल्कि अपनी लाचारी के चलते कैशलेस होने को मजबूर हैं।

हम बात कर रहे हैं सोमालीलैंड की, जहां के बाजारों का नजारा देखकर पहली बार में किसी भी अजनबी की आंखें फटी की फटी रह जाएं। यहां की सड़कों पर फल, अनाज या कपड़ों की तरह ही नोटों की गड्डियां थक्कों में सजी रहती हैं, जिन्हें ‘मनी मार्केट’ कहा जाता है। यहां महंगाई और मुद्रा के अवमूल्यन का स्तर इस कदर बढ़ चुका है कि रोजमर्रा के राशन या एक सिगरेट के पैकेट के लिए भी जेब नहीं, बल्कि नोटों से भरा झोला लेकर घर से निकलना पड़ता है।

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एक डॉलर के बदले ९ हजार शिलिंग; ट्रक में भरकर ले जाना पड़ता है कैश

सोमालीलैंड की अपनी आधिकारिक मुद्रा है, जिसे ‘सोमालीलैंड शिलिंग’ कहा जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी साख और कीमत इतनी कम है कि महज एक अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए स्थानीय नागरिक को लगभग 9 हजार शिलिंग चुकाने पड़ते हैं। बाजार में सबसे ज्यादा उपलब्धता ५०० और १००० शिलिंग के नोटों की है।

ऐसे में यदि कोई व्यक्ति सोने के आभूषण, जमीन या कोई बड़ी चीज खरीदना चाहे, तो उसे नोटों के बंडल किसी गाड़ी या छोटे ट्रक में लादकर ले जाने पड़ेंगे। इस अव्यवहारिक और भारी-भरकम नकद लेन-देन से निजात पाने के लिए यहां मोबाइल बैंकिंग और डिजिटल वॉलेट का सहारा लिया गया। हालात यह हैं कि रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर सड़क पर भीख मांगने वाले भिखारी तक नकदी छूने से बचते हैं और अपने पास मोबाइल पेमेंट का क्यूआर कोड या नंबर रखते हैं।

खुद को स्वतंत्र मानता है सोमालीलैंड, मगर दुनिया के नक्शे पर वजूद की लड़ाई जारी

भौगोलिक और राजनीतिक नजरिए से देखें तो करीब ४० लाख की आबादी वाला यह क्षेत्र उत्तरी अफ्रीका में अदन की खाड़ी के मुहाने पर स्थित है। साल 1991 में गृहयुद्ध के दौरान इसने खुद को सोमालिया से पूरी तरह अलग घोषित कर लिया था।

सोमालीलैंड की अपनी चुनी हुई सरकार है, अपना अलग प्रशासन है, सेना है और अपनी मुद्रा भी है। इसके बावजूद, संयुक्त राष्ट्र (UN) समेत दुनिया के अधिकांश मुल्कों ने इसे अब तक एक संप्रभु और स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं दी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे आज भी सोमालिया का ही एक हिस्सा माना जाता है, जिसके चलते इसे वैश्विक वित्तीय संस्थाओं से सीधे तौर पर कोई बड़ी आर्थिक मदद भी नहीं मिल पाती।

सूखा, ऊंटों का व्यापार और लास गील की रहस्यमयी गुफाएं

सोमालीलैंड की भौगोलिक परिस्थितियां भी बेहद कठिन हैं। देश का लगभग आधा हिस्सा पूरी तरह से रेगिस्तानी है और बाकी का इलाका अक्सर भीषण सूखे की चपेट में रहता है। खेती के साधन सीमित होने की वजह से यहां की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से पशुपालन, खासकर ऊंटों के निर्यात पर टिकी हुई है।

इसके अलावा तटीय इलाकों में लोग मछली पालन के जरिए अपनी आजीविका चलाते हैं। हालांकि, इन मुश्किलों के बीच यहां का पर्यटन क्षेत्र एक नई उम्मीद बनकर उभरा है। यहां की ‘लास गील’ (Laas Geel) जैसी प्रागैतिहासिक गुफाएं, जिनमें हजारों साल पुराने रॉक आर्ट (शैलचित्र) मौजूद हैं, और खूबसूरत प्राचीन समुद्री तट दुनिया भर के शोधकर्ताओं, पुरातत्वविदों और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, जिससे इस कमजोर अर्थव्यवस्था को थोड़ा सहारा मिलता है।

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