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Vishwakarma Jayanti 2026: जानिए सूर्य देव के प्रचंड तेज से कैसे बना भगवान शिव का त्रिशूल

Vishwakarma Jayanti 2026: जानिए सूर्य देव के प्रचंड तेज से कैसे बना भगवान शिव का त्रिशूल

जानिए सूर्य देव के प्रचंड तेज से कैसे बना भगवान शिव का त्रिशूल

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AAmandeep Singh

Vishwakarma Jayanti 2026: देवों के देव महादेव के हाथों में सुशोभित त्रिशूल केवल एक अस्त्र मात्र नहीं है, बल्कि वह संपूर्ण ब्रह्मांड की ऊर्जा, रचना और विनाश के संतुलन का प्रतीक माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सृष्टि को अभय प्रदान करने वाले इस त्रिशूल का निर्माण किसने किया था? पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, इसका निर्माण किसी साधारण धातु से नहीं, बल्कि सूर्य देव के देदीप्यमान तेज से हुआ था और इसे आकार दिया था देवताओं के परम शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा ने। आज, 17 सितंबर 2026 को विश्वकर्मा पूजन के अवसर पर इस कथा का स्मरण करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

सूर्य देव के तेज और विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से जुड़ी है कथा

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विष्णु पुराण के तृतीय अंश के दूसरे अध्याय में एक बड़ा ही दिलचस्प प्रसंग मिलता है। भगवान विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा का विवाह भगवान सूर्य देव के साथ हुआ था। हालांकि, सूर्य देव का तेज इतना प्रचंड और भयावह था कि देवी संज्ञा उनके समीप रहने में असमर्थ महसूस करती थीं। अपनी इस व्यथा को लेकर जब संज्ञा अपने पिता विश्वकर्मा के पास पहुंचीं, तो उन्होंने इसका आध्यात्मिक समाधान निकाला।

शाण चक्र पर तराशा गया सूर्य का प्रचंड तेज

भगवान विश्वकर्मा ने सूर्य देव से विनम्र निवेदन किया और उनकी सहमति प्राप्त कर उन्हें अपने तक्षण यंत्र यानी शाण चक्र पर चढ़ाया। इसके बाद उन्होंने सूर्य के अति-प्रचंड तेज के आठवें भाग को तराश कर अलग कर दिया, जिससे सूर्य देव का रूप सौम्य और सहन करने योग्य हो गया। साम्ब पुराण के 14वें अध्याय में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि सूर्य के उसी छांटे गए दिव्य तेज का उपयोग करके भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए सबसे अचूक और शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्र तैयार किए थे।

त्रिशूल के साथ बने सुदर्शन चक्र और अमोघ शक्ति

सूर्य देव के उसी असीम तेज से भगवान विश्वकर्मा ने भगवान शिव के लिए ‘त्रिशूल’ का निर्माण किया। इसके अलावा, भगवान विष्णु का संहारक ‘सुदर्शन चक्र’, माता भगवती का ‘परशु’, भगवान कार्तिकेय की ‘अमोघ शक्ति’ तथा अन्य देवताओं के लिए दिव्यास्त्र भी इसी तेज से गढ़े गए।

सृष्टि के तीन गुणों का संतुलन है त्रिशूल

शास्त्रों में शिव के त्रिशूल का आध्यात्मिक महत्व भी व्यापक रूप से समझाया गया है। त्रिशूल की तीनों शूलियां (नोक) भौतिक दुनिया के तीनों लोकों के साथ-साथ प्रकृति के तीन मुख्य गुणों—सत्व, रज और तम का प्रतिनिधित्व करती हैं। महादेव का त्रिशूल यह संदेश देता है कि जब तक इन तीनों गुणों में संतुलन है, तब तक सृष्टि में शांति कायम रहती है, और इनका असंतुलन प्रलय का कारण बनता है।

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