September 12, 2026

Hartalika Teej: हरितालिका तीज पर क्यों बनाई जाती है बालू की शिव-पार्वती प्रतिमा? जानिए पौराणिक कथा और महत्व

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Hartalika Teej: हरितालिका तीज पर क्यों बनाई जाती है बालू की शिव-पार्वती प्रतिमा? जानिए पौराणिक कथा और महत्व

हरितालिका तीज पर क्यों बनाई जाती है बालू की शिव-पार्वती प्रतिमा? जानिए पौराणिक कथा और महत्व

Hartalika Teej: हरितालिका तीज पर सुहागिनों के निर्जला व्रत और 16 श्रृंगार की धूम हर तरफ देखने को मिलती है, लेकिन इस पूजा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है—बालू या मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश की प्रतिमा तैयार करना।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब माता पार्वती अपने पिता हिमालय के घर से निकलकर एकांत जंगल में भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए साधना कर रही थीं, तब उनके पास न कोई भव्य मंदिर था और न ही कोई सुसज्जित मूर्ति। उन्होंने नदी के तट से बालू (रेत) और शुद्ध मिट्टी लेकर अपने हाथों से शिवलिंग तैयार किया था और कठिन तप किया था।

माता पार्वती की उसी अनन्य भक्ति और निष्छल साधना को याद करते हुए आज भी व्रती महिलाएं बाजार से रेडीमेड मूर्तियां लाने के बजाय खुद अपने हाथों से बालू या मिट्टी की प्रतिमाएं बनाना ज्यादा फलदायी मानती हैं।

‘हरतालिका’ नाम के पीछे की कथा: जब सखियों ने किया था पार्वती का हरण

पर्व का नाम ‘हरतालिका’ अपने आप में माता पार्वती के जीवन की एक बड़ी घटना को समेटे हुए है। संस्कृत और लोक परंपराओं के अनुसार, यह शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘हरत’ (हरण करना या ले जाना) और ‘आलिका’ (सखी या सहेली)।

पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती के पिता पर्वतराज हिमालय उनका विवाह भगवान विष्णु से तय करना चाहते थे। लेकिन पार्वती जी मन ही मन शिव को अपना पति स्वीकार कर चुकी थीं। जब उन्होंने यह बात अपनी सहेलियों को बताई, तो सखियों ने उन्हें पिता के महल से गुप्त रूप से हरण कर लिया और एक बीहड़ जंगल में छिपा दिया। उसी एकांत वन में रहकर पार्वती जी ने निर्जला व्रत रखा और मिट्टी का शिवलिंग बनाकर शिवजी को प्रसन्न किया। सखी द्वारा हरण किए जाने के कारण ही इस कठिन व्रत का नाम ‘हरतालिका तीज’ पड़ा।

भव्यता नहीं, भावना की प्रधानता: मिट्टी की प्रतिमा का आध्यात्मिक संदेश

शास्त्रों में मिट्टी से प्रतिमा बनाकर पूजा करने का एक गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व भी बताया गया है। बालू या मिट्टी धरती मां का स्वरूप है, जो सुलभ और पवित्र है। यह परंपरा सिखाती है कि ईश्वर की भक्ति में सोने-चांदी की महंगी मूर्तियों या आडंबर की जरूरत नहीं होती, बल्कि वहां मन की शुद्धता और अटूट संकल्प ही सर्वोपरि है।

इसके अलावा, पूजा के बाद इन प्रतिमाओं का पवित्र नदियों या जलस्रोतों में विसर्जन यह संदेश भी देता है कि यह पंचभौतिक शरीर और सांसारिक वस्तुएं नश्वर हैं, जो अंततः प्रकृति में ही विलीन हो जाती हैं।

आदर्श दांपत्य का प्रतीक है शिव-पार्वती का स्वरूप

हरितालिका तीज की पूजा का केंद्र बिंदु भगवान शिव और जगद्जननी पार्वती का पावन संबंध है। हिंदू धर्मशास्त्रों में शिव-शक्ति की इस जोड़ी को सर्वश्रेष्ठ और आदर्श दांपत्य का प्रतीक माना गया है, जहां समर्पण, सहअस्तित्व और एक-दूसरे के प्रति अगाध सम्मान है।

यही कारण है कि सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए दिन-रात निर्जल रहकर यह साधना करती हैं। वहीं, कुंवारी लड़कियां मनचाहा और शिव जैसा गुणी जीवनसाथी पाने की कामना से मिट्टी के शिव-पार्वती की आराधना करती हैं।Hartalika Teej: हरितालिका तीज पर क्यों बनाई जाती है बालू की शिव-पार्वती प्रतिमा? जानिए पौराणिक कथा और महत्व

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