GMADA Land Scam ED Investigation : 238 करोड़ के बैंक फ्रॉड से खुला 10,000 करोड़ का गमाडा स्कैम
238 करोड़ के बैंक फ्रॉड से खुला 10,000 करोड़ का गमाडा स्कैम
GMADA Land Scam ED Investigation : मोहाली स्थित ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (GMADA) के मुख्यालय में प्रवर्तन निदेशालय (ED) का तीन दिवसीय गहन तलाशी अभियान एक अभूतपूर्व प्रशासनिक व राजनीतिक भूचाल में तब्दील हो चुका है। तीन दिनों तक रिकॉर्ड्स और डिजिटल दस्तावेजों को खंगालने के बाद ईडी ने खुलासा किया है कि गमाडा के पास मौजूद बिना बिकी जमीनों की रिजर्व प्राइस (आरक्षित कीमत) को जानबूझकर गैर-कानूनी तरीके से काफी कम किया गया। इस सोची-समझी हेराफेरी से राज्य के सरकारी खजाने को करीब 10,000 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान हुआ है।
केंद्रीय जांच एजेंसी के अधिकारियों के अनुसार, इस पूरे खेल का मकसद चुनिंदा बिल्डरों और राजनीतिक आकाओं को करोड़ों का अनुचित वित्तीय फायदा पहुंचाना था। मोहाली के रियल एस्टेट सेक्टर में लंबे समय से चल रही इस गड़बड़ी पर अब जांच की आंच पंजाब सरकार के शीर्ष प्रशासनिक तंत्र तक पहुंच गई है।
सेक्टर-39 का कमरा नंबर 926 और PUDA दफ्तर का अनधिकृत कमरा
ईडी द्वारा कोर्ट और मीडिया के समक्ष रखी गई जानकारी के मुताबिक, इस पूरे घालमेल में आम आदमी पार्टी के नेताओं—सत्येंद्र जैन और पंजाब मामलों के प्रभारी मनीष सिसोदिया—की भूमिका गंभीर सवालों के घेरे में है। जांच एजेंसी का आरोप है कि दोनों नेता गमाडा के प्रशासनिक अधिकारियों के साथ अनौपचारिक व गैर-सरकारी बैठकें कर रहे थे।
इन बैठकों के जरिए मास्टर प्लान में बदलाव, जमीन अधिग्रहण, मुआवजा तय करने और जमीनों की नीलामी जैसे अत्यंत संवेदनशील नीतिगत फैसलों को सीधे तौर पर प्रभावित किया जाता था।
एजेंसी का दावा है कि ये अनधिकृत बैठकें चंडीगढ़ के सेक्टर-39 स्थित कमरा नंबर 926 में आयोजित की जाती थीं, जो आप नेता सनी सिंह अहलूवालिया के नाम पर आवंटित है। इन बैठकों में गमाडा के वरिष्ठ अधिकारी बाकायदा पूडा (PUDA) भवन से सरकारी फाइलें लेकर पहुंचते थे। इतना ही नहीं, सत्येंद्र जैन के ओएसडी अमरेंद्र झा ने बिना किसी आधिकारिक पद या सरकारी नियुक्ति के पूडा भवन में एक पूरा कमरा दबा रखा था, जहां से अफसरों को सीधे मौखिक आदेश जारी किए जाते थे।
238 करोड़ के बैंक फ्रॉड से जुड़ा 10 हजार करोड़ के घोटाले का तार
यह समूचा प्रकरण मूल रूप से सीबीआई (CBI) द्वारा दर्ज 238 करोड़ रुपये के बैंक धोखाधड़ी मामले की जांच के दौरान सामने आया। सीबीआई ने यह एफआईआर मेसर्स तिरुपति इंफ्रा प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रमोटरों—जगमोहन गर्ग और मनमोहन गर्ग—के खिलाफ दर्ज की थी। जब ईडी ने इस धोखाधड़ी के पैसों के लेन-देन (मनी ट्रेल) की पड़ताल शुरू की, तो गमाडा अफसरों की गहरी संलिप्तता की परतें उधड़ती चली गईं।
जांच में पाया गया कि गमाडा अधिकारियों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए मेसर्स रेमिगेट इंफ्रा डेवलपर्स को 57 करोड़ रुपये के सरकारी बकाए में नियमविरुद्ध भारी छूट दी। इसके अलावा, जिन भूखंडों का आवंटन पूर्व में निरस्त (रिजेक्ट) कर दिया गया था, उन्हें भी साठगांठ करके दोबारा अलॉट कर दिया गया। जब ईडी ने अधिकारियों के मोबाइल फोन जब्त कर फोरेंसिक जांच कराई, तो उनमें कई संदिग्ध व्हाट्सएप चैट और हवाला लेन-देन के पुख्ता सबूत बरामद हुए हैं।
जांच के दायरे में आए IAS-PCS अफसर और हाईकोर्ट में सरकार का बैकफुट
इस जांच की आंच ने पंजाब कैडर की नौकरशाही में हड़कंप मचा दिया है। ईडी के रडार पर इस समय पंजाब के कई कद्दावर नौकरशाह आ चुके हैं, जिनमें शामिल हैं:
विकास गर्ग (IAS) : प्रमुख सचिव
संदीप ऋषि (IAS) : मुख्य प्रशासक, गमाडा
राजीव गुप्ता (IAS) : पूर्व मुख्य प्रशासक
अमरिंदर मल्ही (PCS) : अतिरिक्त मुख्य प्रशासक (ACA)
रोहित जिंदल (PCS) : भूमि अधिग्रहण कलेक्टर (LAC)
ईडी की सख्त कार्रवाई से घबराई पंजाब सरकार ने रातों-रात पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का रुख करते हुए एक हेबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर की थी। सरकार का आरोप था कि ईडी ने उनके शीर्ष अधिकारियों को गैर-कानूनी तरीके से बंधक बनाकर रखा हुआ है।
हालांकि, हाईकोर्ट द्वारा तुरंत नियुक्त किए गए वारंट अफसर राजन नंदा की ऑन-स्पॉट जांच रिपोर्ट ने सरकार के दावों की हवा निकाल दी। रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि किसी भी अधिकारी को अवैध हिरासत में नहीं रखा गया था और दफ्तर का काम सामान्य रूप से चल रहा था। इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही पंजाब सरकार को हाईकोर्ट से अपनी याचिका बिना शर्त वापस लेनी पड़ी।
