राजस्थान में सूखे पर सियासत तेज, गहलोत ने सरकार से पानी और चारे की व्यवस्था की मांग की
राजस्थान में दशक के सबसे बड़े अकाल का दावा
Rajasthan Drought Crisis: राजस्थान के पश्चिमी हिस्सों में कम बारिश के कारण सूखे और पानी-चारे के संकट का मुद्दा सामने आया है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने शनिवार को राज्य के हालात को लेकर सरकार से तत्काल कदम उठाने की मांग की। गहलोत ने दावा किया कि राजस्थान इस समय पिछले 10 साल के सबसे बड़े अकाल का सामना कर रहा है। हालिया रिपोर्टों में भी राज्य के कई जिलों में सूखे की स्थिति और पेयजल, चारे तथा रोजगार से जुड़ी परेशानियों का उल्लेख किया गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब 16,400 गांव और 52 शहर इस संकट से प्रभावित बताए गए हैं।
गहलोत ने अपने बयान में कहा कि जोधपुर जिले के करीब 2,000 गांवों में सूखे जैसे हालात हैं। उन्होंने बाड़मेर के 2,460, बालोतरा के 1,216 और जैसलमेर के 961 गांवों को सूखे की चपेट में होने का दावा किया। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि कमोबेश ऐसी स्थिति पूरे मारवाड़ और राजस्थान के दूसरे हिस्सों में भी देखने को मिल रही है। हालिया रिपोर्टों में भी बाड़मेर, बालोतरा, जैसलमेर, जोधपुर समेत पश्चिमी राजस्थान के कई जिलों में सूखे का संकट बताया गया है। गहलोत का यह आकलन उनका राजनीतिक बयान है। उपलब्ध सरकारी और मीडिया रिपोर्टों में प्रभावित गांवों की संख्या अलग-अलग संदर्भों में दी गई है, इसलिए इन आंकड़ों को संबंधित सरकारी आकलन के साथ देखना जरूरी है।
चारे की कीमत बढ़ने से पशुपालकों पर दबाव
गहलोत ने चारे की बढ़ती कीमतों को लेकर भी चिंता जताई। उनके मुताबिक जोधपुर, बाड़मेर और बालोतरा में चारे की कीमत लगातार बढ़ रही है और करीब 1,200 रुपये प्रति मण तक पहुंचने की बात सामने आ रही है। उन्होंने कहा कि चारे की महंगाई का सीधा असर पशुपालकों पर पड़ रहा है। सूखे की स्थिति में स्थानीय स्तर पर चारा उपलब्ध नहीं होने पर पशुपालकों को बाहर से चारा खरीदना पड़ता है, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है। गहलोत ने कहा कि अकाल और सूखे का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहता। पशुपालकों के लिए पानी और चारा उपलब्ध नहीं होने पर पशुधन को बचाना बड़ी चुनौती बन जाता है।
गहलोत ने राज्य सरकार से प्रभावित क्षेत्रों में पीने के पानी और पशुओं के चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने की मांग की। उन्होंने चारे की बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण के लिए तत्काल कदम उठाने की बात कही। उन्होंने यह भी कहा कि सूखे से प्रभावित ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार और मजदूरी की व्यवस्था पहले से तैयार की जानी चाहिए, ताकि संकट बढ़ने पर लोगों को आय के लिए दूसरे क्षेत्रों की ओर पलायन न करना पड़े। गहलोत ने सरकार से पूरे प्रदेश के लिए एक व्यापक आकस्मिक कार्ययोजना तैयार करने की मांग की है। उनका कहना है कि पानी, चारा और रोजगार के मोर्चे पर पहले से तैयारी करना जरूरी है।
सरकार की ओर से राहत के लिए क्या कदम उठाए जा रहे?
सूखे के मुद्दे पर राज्य सरकार की ओर से भी राहत उपायों की जानकारी सामने आई है। हालिया रिपोर्ट के मुताबिक सरकार प्रभावित क्षेत्रों के लिए एक्शन प्लान तैयार कर रही है। पानी की समस्या से निपटने के लिए 650 वाहन और 3,200 श्रमिक लगाए गए हैं। हैंडपंपों की मरम्मत के लिए भी वाहनों की व्यवस्था की गई है। राजस्थान सरकार के आधिकारिक बयान के मुताबिक कम बारिश से प्रभावित बाड़मेर में आपात पेयजल व्यवस्था और टैंकरों के जरिए पानी की आपूर्ति 31 दिसंबर तक जारी रखने की घोषणा की गई है। इसके अलावा कम बारिश वाले क्षेत्रों में आपात कार्यों के लिए जिला कलेक्टर को एक करोड़ रुपये तक के काम स्वीकृत करने की व्यवस्था बताई गई है।
राज्य सरकार ने बाड़मेर, बालोतरा और जैसलमेर सहित चारे की कमी वाले प्रभावित क्षेत्रों में चारा डिपो स्थापित करने की भी बात कही है। इसका उद्देश्य पशुपालकों को स्थानीय स्तर पर चारा उपलब्ध कराना है। बाड़मेर में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने 30 सितंबर को कम बारिश से पैदा हुई स्थिति को देखते हुए राहत से जुड़े कई ऐलान किए थे। सरकार के अनुसार प्रभावित इलाकों में पानी की उपलब्धता और पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था को प्राथमिकता दी जा रही है।
गहलोत ने सरकार पर लगाया ढिलाई का आरोप
पूर्व मुख्यमंत्री ने सरकार पर राहत कार्यों में देरी का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि बाड़मेर में मुख्यमंत्री की ओर से की गई घोषणाओं के बाद भी कथित तौर पर प्रशासन को लिखित स्वीकृति का इंतजार करना पड़ रहा है। गहलोत ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए सरकारी मशीनरी को तेजी से काम करना चाहिए। उन्होंने प्रदेश स्तर पर एक ऐसी आकस्मिक कार्ययोजना बनाने की मांग की, जिसमें प्रभावित इलाकों के लिए पानी, चारा, रोजगार और अन्य जरूरी राहत उपायों की स्पष्ट व्यवस्था हो। हालांकि, सरकार की ओर से पहले ही प्रभावित क्षेत्रों के लिए पानी और चारे से जुड़े कई उपायों की घोषणा की जा चुकी है। इसलिए अब मुख्य मुद्दा इन व्यवस्थाओं के जमीन पर लागू होने और प्रभावित गांवों तक राहत पहुंचने का है।
पश्चिमी राजस्थान में बारिश की कमी का असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधे पड़ता है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में परिवार खेती के साथ पशुपालन पर निर्भर हैं। ऐसे में बारिश कम होने पर खेतों के साथ पशुओं के लिए चारा और पानी जुटाना भी चुनौती बन जाता है। सरकार के सामने सबसे बड़ी जरूरत प्रभावित गांवों तक पेयजल पहुंचाने, पशुओं के लिए पर्याप्त चारा उपलब्ध कराने और ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार के अवसर बनाए रखने की है। आने वाले दिनों में सरकारी राहत योजना की पहुंच और बारिश की स्थिति इस संकट की गंभीरता को तय करने वाले प्रमुख कारक होंगे।
