गांधीजी की स्मृतियों से जुड़ी पीएमसीएच इमारत संरक्षित करने की मांग
गांधीजी की यादों से जुड़ी पीएमसीएच की इमारत बचाने की मांग
Gandhi Heritage Building: पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल यानी पीएमसीएच की ऐतिहासिक इमारत को बचाने की मांग फिर तेज हो गई है। अस्पताल परिसर में पुराने बांकीपुर जनरल हॉस्पिटल से जुड़े 100 साल से ज्यादा पुराने हथुआ वार्ड को सितंबर की शुरुआत में बुलडोजर से गिराए जाने के बाद पूर्व छात्रों, गांधीवादियों और विरासत प्रेमियों ने बिहार सरकार से बचे हुए हिस्से को संरक्षित करने की अपील की है। इस इमारत का संबंध महात्मा गांधी से भी रहा है। 15 मई 1947 को आजादी से करीब तीन महीने पहले गांधीजी अपनी पोती मनु की अपेंडिसाइटिस सर्जरी के लिए पीएमसीएच आए थे।
विरासत विशेषज्ञों का कहना है कि इस ऐतिहासिक भवन को पूरी तरह गिराने के बजाय इसके बचे हिस्से को संरक्षित और बहाल किया जा सकता है। दो मंजिला यह इमारत अपने आकर्षक डोरिक स्तंभों और पुराने वास्तुशिल्प के लिए भी जानी जाती रही है। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि इसे संग्रहालय के रूप में विकसित किया जाए, जहां पीएमसीएच के इतिहास और गांधीजी से जुड़े प्रसंगों को प्रदर्शित किया जा सके।
पुराने जनरल हॉस्पिटल का उत्तरी हिस्सा हथुआ वार्ड और दक्षिणी हिस्सा गुजरी वार्ड के नाम से जाना जाता था। इमारत के भूतल और पहली मंजिल पर कई चिकित्सा वार्ड थे। भवन में ब्रिटिश काल की एक पुरानी लिफ्ट भी लगी हुई थी, जो अब काम नहीं करती है। हथुआ वार्ड के एक हिस्से को गिराए जाने के बाद पिछले कुछ दिनों से बुलडोजर का काम रुका हुआ है। फिलहाल दो मंजिला दक्षिणी विंग, केंद्रीय पोर्टिको और ऊपरी मंजिल तक जाने वाली पुरानी सीढ़ियां खड़ी हैं। सामने की तरफ पुरानी लिफ्ट भी मौजूद है। पोर्टिको के सामने बनी दो मंजिला इमारत भी अब तक बची हुई है, जो एक पुल के जरिए मुख्य भवन से जुड़ी हुई है। इसी बचे हुए हिस्से को लेकर पूर्व छात्रों और धरोहर प्रेमियों को उम्मीद है कि सरकार इसके संरक्षण पर विचार कर सकती है। उनका कहना है कि अस्पताल के आधुनिकीकरण के साथ ऐतिहासिक इमारतों को बचाने का रास्ता भी निकाला जा सकता है।
1947 में मनु की सर्जरी के दौरान पीएमसीएच आए थे गांधीजी
इस इमारत का सबसे अहम ऐतिहासिक संबंध महात्मा गांधी की 1947 की पीएमसीएच यात्रा से है। 15 मई 1947 को गांधीजी अपनी पोती मनु की अपेंडिसाइटिस की सर्जरी के लिए यहां पहुंचे थे। उस समय देश आजादी की ओर बढ़ रहा था और बिहार भी कई महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक घटनाओं का केंद्र था। बताया गया है कि गांधीजी मनु की तबीयत को लेकर बेहद चिंतित थे। उन्होंने सर्जिकल मास्क पहनकर ऑपरेशन थिएटर में बैठकर उनकी पूरी सर्जरी देखी थी। यह ऑपरेशन पुराने जनरल हॉस्पिटल भवन में स्थित ऑपरेशन थिएटर में हुआ था। यही वजह है कि गांधीवादियों और विरासत संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि गांधीजी से जुड़ी इस इमारत को केवल पुराना अस्पताल भवन मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, यह स्थान पीएमसीएच के चिकित्सा इतिहास के साथ देश के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रसंग की भी याद दिलाता है।
लंदन में रह रहे पूर्व छात्र ने कहा- ऐसी विरासत नहीं गिरनी चाहिए थी
ब्रिटेन में रह रहे करीब 86 वर्षीय वरिष्ठ ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. कुंवर शाही ने इमारत के ध्वस्तीकरण पर दुख जताया है। उन्होंने 1965 में पीएमसीएच से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की थी और बाद में यहीं से मास्टर डिग्री भी हासिल की थी। डॉ. शाही ने कहा कि इतनी ऐतिहासिक विरासत वाली इमारत को इस तरह नहीं गिराया जाना चाहिए था। उनके मुताबिक इस भवन ने पीएमसीएच के विकास को देखा है और इसकी दहलीज से कई पीढ़ियों के डॉक्टर निकले हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इमारत का निर्माण जनता से मिले दान की राशि से हुआ था, इसलिए इसे संरक्षित करने का एक और मजबूत आधार है। उन्होंने अपील की कि कम से कम उस हिस्से को बचाया जाए, जहां 1947 में महात्मा गांधी आए थे। उनका कहना है कि नई इमारतों की जरूरत अपनी जगह है, लेकिन गांधीजी से जुड़ी ऐतिहासिक जगह को बचाने का प्रयास भी किया जाना चाहिए।
दिल्ली स्थित गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति में वरिष्ठ पद पर रह चुके एक गांधीवादी ने भी गांधीजी से जुड़ी विरासत को बचाने की जरूरत बताई। उनका कहना है कि बापू से जुड़ी हर विरासत, चाहे वह अस्पताल हो या कोई दूसरी इमारत, संरक्षित की जानी चाहिए और इसके लिए हर संभव प्रयास होना चाहिए। पीएमसीएच एल्युमनी एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. सत्यजीत कुमार सिंह ने भी बताया कि जब वह एल्युमनी संस्था के अध्यक्ष थे, तब उन्होंने राज्य सरकार से इस इमारत को बचाने की अपील की थी। अब ध्वस्तीकरण का खतरा बढ़ने के बाद उन्होंने एक बार फिर सरकार से कम से कम गांधीजी से जुड़ी इमारत को बचाने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि जिस भवन में गांधीजी अपनी पोती मनु की सर्जरी के समय आए थे, उसका ऐतिहासिक महत्व अलग है। इसलिए अस्पताल परिसर के विकास की योजना में इस हिस्से के संरक्षण की संभावना तलाशनी चाहिए।
पीएमसीएच की नई इमारतें जरूरी, लेकिन पुरानी विरासत भी बचाने की मांग
पीएमसीएच एल्युमनी एसोसिएशन के मौजूदा अध्यक्ष डॉ. रामेंद्र नारायण सिंह भी इस मांग से जुड़े हैं। वर्ष 2025 में पीएमसीएच के शताब्दी समारोह की आयोजन टीम में शामिल रहे डॉ. सिंह ने कहा कि अस्पताल को आधुनिक बनाने के लिए नई इमारतों की जरूरत है, लेकिन परिसर में मौजूद ऐतिहासिक भवन को भी बचाया जा सकता था। उन्होंने उम्मीद जताई कि अस्पताल की समग्र योजना में गांधीजी से जुड़े इस भवन को संरक्षित करने का रास्ता निकाला जाएगा। पूर्व छात्रों का कहना है कि आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के साथ ऐतिहासिक इमारतों का संरक्षण पीएमसीएच को चिकित्सा और विरासत, दोनों स्तरों पर खास पहचान दे सकता है।
विरासत विशेषज्ञों ने बचे हुए भवन को संरक्षित करके संग्रहालय के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया है। ऐसा होने पर यहां पीएमसीएच के पुराने चिकित्सा इतिहास, भवन की वास्तुकला और महात्मा गांधी से जुड़े 1947 के प्रसंग को एक जगह प्रदर्शित किया जा सकता है। पीएमसीएच देश के पुराने और प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में शामिल रहा है। ऐसे में पुराने भवन का संरक्षण केवल एक इमारत को बचाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मेडिकल शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और उससे जुड़े लोगों की कई पीढ़ियों की यादों को भी सुरक्षित रखने का माध्यम बन सकता है। अब पूर्व छात्रों, गांधीवादियों और विरासत प्रेमियों की नजर बिहार सरकार के अगले कदम पर है। उनकी मांग है कि अस्पताल के विकास और निर्माण कार्यों के बीच इस ऐतिहासिक इमारत के बचे हिस्से को सुरक्षित रखने का विकल्प तलाशा जाए, खासकर उस हिस्से को जिसका संबंध महात्मा गांधी की 1947 की पीएमसीएच यात्रा से रहा है।
