Ambala News: हरियाणा सरकार की ओर से पेराई सत्र 2026-27 के लिए गन्ने के राज्य परामर्शित मूल्य (SAP) में केवल 15 रुपये प्रति क्विंटल का इजाफा किए जाने के फैसले ने सूबे के किसान आंदोलन की आग को फिर से भड़का दिया है। सरकार के इस कदम को किसान संगठनों ने अपनी मेहनत और बढ़ती लागत का सरासर अपमान बताया है। इसी नाराजगी के विरोध में शुक्रवार को नारायणगढ़ की सड़कों पर भारतीय किसान यूनियन अंबाला और गन्ना संघर्ष समिति ने कंधे से कंधा मिलाकर जोरदार प्रदर्शन किया।
आक्रोशित किसानों ने पहले तो अनाज मंडी के पास एकत्र होकर सरकार विरोधी नारेबाजी की और फिर मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी व राज्य के कृषि मंत्री का प्रतीकात्मक पुतला फूंककर अपने भारी गुस्से का इजहार किया। इस विरोध प्रदर्शन में बीकेयू (चढ़ूनी) के जिलाध्यक्ष मलकीत सिंह, जिला महासचिव राजीव शर्मा, युवा जिलाध्यक्ष गुलाब पूनिया, गन्ना संघर्ष समिति के अध्यक्ष विनोद राणा और बॉबी राणा समेत इलाके के सैकड़ों गन्ना उत्पादक किसान मौजूद रहे।
’15 पैसे किलो बढ़ाकर सरकार क्या साबित करना चाहती है?’
प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए बीकेयू जिलाध्यक्ष मलकीत सिंह ने सरकार के आंकड़ों की पोल खोली। उन्होंने कहा कि 15 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी को अगर गणित के हिसाब से देखा जाए तो यह महज 15 पैसे प्रति किलो बैठती है। एक तरफ जहां खुले बाजार में चीनी के दाम लगातार आसमान छू रहे हैं और चीनी मिल मालिक मोटा मुनाफा कमा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ खून-पसीना बहाने वाले किसान को केवल 15 पैसे थमाए जा रहे हैं। किसानों ने साफ कहा कि ऐसी प्रतीकात्मक बढ़ोतरी करने से बेहतर है कि सरकार इसे तुरंत वापस ले ले।
मलकीत सिंह ने खेती की बढ़ती कड़वी सच्चाई बयां करते हुए कहा कि आज डीजल की कीमतें 100 रुपये प्रति लीटर के आसपास बनी हुई हैं। खाद, कीटनाशक दवाइयों और ट्रैक्टर की मेंटेनेंस के दाम दो से तीन गुना बढ़ चुके हैं। कटाई और छिलाई करने वाले लेबर के रेट ही हर सीजन में 10 से 15 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ जाते हैं। ऐसे में जब मजदूरी का खर्च ही 15 रुपये बढ़ गया, तो किसान इस 15 रुपये की बढ़ोतरी में अपनी लागत कैसे निकालेगा और अपने बच्चों का पेट कैसे पालेगा?
10 साल से वही संघर्ष, अब विकल्प तलाशने की नौबत
किसान नेताओं का कहना था कि एक किसान पूरे 12 महीने अपनी जमीन को सींचकर गन्ने की फसल तैयार करता है, लेकिन पेराई सीजन शुरू होते ही उसे कभी भाव के लिए तो कभी समय पर भुगतान (Payment) के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है। पिछले एक दशक से किसान लगातार गन्ने के वाजिब दाम की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन कोई भी सरकार उनकी वास्तविक समस्याओं का स्थायी समाधान निकालने को गंभीर नहीं दिखती।
निराशा जताते हुए किसान नेताओं ने गन्ना उत्पादकों से एक कड़वी अपील भी की। उन्होंने कहा कि अगर गन्ने की फसल में लागत निकालना भी मुहाल हो रहा है और सरकार हर साल किसानों का मजाक उड़ा रही है, तो अब किसानों को फसल विविधीकरण (Crop Diversification) की तरफ सोचना होगा। उन्होंने किसानों को गन्ने का रकबा घटाकर दूसरी नकदी फसलों या सफेदे की खेती जैसे विकल्पों पर विचार करने की सलाह दी।
सीएम ने घोषित किए आगामी दो सत्रों के रेट, किसानों ने बताया नाकाफी
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने 29 अक्टूबर को चंडीगढ़ में अगले दो पेराई सत्रों के लिए गन्ने के दामों की अग्रिम घोषणा की थी। सरकारी घोषणा के मुताबिक, 2025-26 के 415 रुपये प्रति क्विंटल के भाव को वर्ष 2026-27 के लिए 15 रुपये बढ़ाकर 430 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है। वहीं, अगले पेराई सत्र 2027-28 के लिए इसे सीधे 450 रुपये प्रति क्विंटल करने का वादा किया गया है। यानी दो सालों में कुल 35 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी होगी।
मुख्यमंत्री कार्यालय का दावा है कि इस फैसले से किसानों की प्रति एकड़ आय में लगभग 10,000 से 11,300 रुपये तक की सीधी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। हालांकि, धरातल पर डटे किसान संगठनों का स्पष्ट मानना है कि यह दावे सिर्फ कागजी आंकड़े हैं, क्योंकि बढ़ती महंगाई और बेकाबू लागत के सामने 15 रुपये की यह मामूली बढ़ोतरी पूरी तरह बेमानी है।
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