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Money Happiness Research: खुश रहने का साइंटिफिक तरीका, अचानक मिले पैसों को इस तरह खर्च करने वाले लोग रहते हैं ज्यादा संतुष्ट

Money Happiness Research: खुश रहने का साइंटिफिक तरीका, अचानक मिले पैसों को इस तरह खर्च करने वाले लोग रहते हैं ज्यादा संतुष्ट

खुश रहने का साइंटिफिक तरीका, अचानक मिले पैसों को इस तरह खर्च करने वाले लोग रहते हैं ज्यादा संतुष्ट

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AAmandeep Singh

Money Happiness Research: सोचिए कि सुबह अचानक आपकी नींद खुले, आप मोबाइल स्क्रीन पर बैंक का मैसेज देखें और उसमें लिखा हो कि आपके खाते में 8 लाख रुपये क्रेडिट हो गए हैं। (How to Spend Money for Happiness) इस अचानक मिली रकम को देखते ही दिमाग में कई ख्याल तैरने लगेंगे— क्या नई लग्जरी कार या महंगा स्मार्टफोन खरीदा जाए, पुराना कर्ज निपटाया जाए, किसी खूबसूरत जगह की सैर की जाए, अपनी पढ़ाई पर खर्च किया जाए या फिर किसी जरूरतमंद की मदद की जाए?

लेकिन असली सवाल यह है कि इनमें से किस विकल्प को चुनने पर आपको सबसे ज्यादा और टिकाऊ खुशी मिलेगी? इसी इंसानी मनोविज्ञान को गहराई से समझने के लिए (Unexpected Money Wellbeing Harvard) हार्वर्ड टी.एच. चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ (Harvard TH Chan School Research) के शोधकर्ताओं ने एक अनूठा अध्ययन किया। इसमें भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, केन्या और ब्राजील जैसे विकसित और विकासशील देशों के 300 लोगों को शामिल किया गया।

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300 लोगों पर हुआ वैश्विक प्रयोग, 200 को मिले 10-10 हजार डॉलर

शोध के दौरान 200 प्रतिभागियों को अचानक 10,000 डॉलर (लगभग 8 लाख रुपये) की राशि दी गई और शर्त रखी गई कि उन्हें यह पूरी रकम तीन महीने के भीतर ही खर्च करनी होगी। वहीं, 100 लोगों के एक समूह (कंट्रोल ग्रुप) को कोई अतिरिक्त पैसा नहीं दिया गया।

अगले छह महीनों तक शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों के हर महीने के खर्चों, उनके द्वारा खरीदी गई चीजों और उससे मिलने वाली मानसिक संतुष्टि का वैज्ञानिक रूप से आकलन किया। नतीजों ने चौंकाया— (Money and Mental Wellbeing Research) जिन लोगों ने इस पैसे का इस्तेमाल गैजेट्स या केवल सामान खरीदने में किया, उनकी खुशी का स्तर बहुत जल्द सामान्य हो गया। इसके उलट, जिन लोगों ने इस रकम को उच्च शिक्षा, नई स्किल सीखने, यात्राओं (Experience), पर्सनल केयर (स्वास्थ्य व आत्म-देखभाल) और चैरिटी (दूसरों की मदद) में लगाया, वे लंबे समय तक खुश और तनावमुक्त पाए गए।

देश की आर्थिक स्थिति तय करती है आपकी खुशी का पैमाना

रिसर्च का एक सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि पैसे से मिलने वाली खुशी हर देश में एक जैसी नहीं थी। अमीर (हाई-इनकम) देशों के नागरिकों को समय बचाने वाली सेवाओं (जैसे हाउसहेल्प या डिलीवरी सर्विसेज) और दूसरों को गिफ्ट देने पर ज्यादा संतुष्टि मिली। इन देशों में कर्ज चुकाने या घर का रिनोवेशन कराने से खुशी का ग्राफ बहुत ज्यादा नहीं बढ़ा।

इसके विपरीत, विकासशील या कम आय वाले देशों के लोगों के लिए कर्ज चुकता होना और सिर पर मजबूत छत होना ही मानसिक शांति का सबसे बड़ा जरिया साबित हुआ। इससे साफ होता है कि इंसान की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि यह तय करती है कि कौन-सा खर्च उसकी वेलबीइंग को बढ़ाएगा।

खुशी का कोई फिक्स फॉर्मूला नहीं, लेकिन सबक साफ है

कंट्रोल ग्रुप से तुलना करने पर यह स्पष्ट हुआ कि जिन्हें अचानक पैसा मिला, उनकी ओवरऑल वेलबीइंग बेहतर रही। लेकिन पैसे का होना ही पूरी कहानी नहीं है; असली बात यह है कि उस रकम का प्रबंधन किस तरह किया गया।

हालांकि, (Behavioral Economics Wealth Study) शोधकर्ता यह स्पष्ट करते हैं कि यह रिसर्च किसी भी इंसान को पैसा खर्च करने का कोई तय या घिसा-पिटा फॉर्मूला नहीं देती। हर व्यक्ति की जरूरतें, पारिवारिक परिस्थितियां और प्राथमिकताएं अलग होती हैं। फिर भी, यह अध्ययन एक बड़ा सबक जरूर देता है— यदि कभी जीवन में अचानक कोई बड़ी धनराशि आपके हाथ लगे, तो केवल भौतिक चीजें बटोरने के बजाय उसका कुछ हिस्सा अनुभवों को जीने, खुद को बेहतर बनाने और समाज को लौटाने में लगाएं। यही पैसा खर्च करने की सच्ची सार्थकता है।

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