Lamayuru Moonland Ladakh: भारत के सुदूर उत्तर में स्थित लद्दाख सिर्फ अपनी बर्फीली चोटियों और नीली झीलों के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यहां कुछ ऐसे कोने भी छिपे हैं जो आपको किसी दूसरी ही दुनिया की सैर करा देते हैं। लेह-श्रीनगर हाईवे पर स्थित लामायुरू एक ऐसा ही अनोखा और तिलस्मी गांव है। दूर तक फैली भूरी, सुनहरी और स्लेटी रंग की आकृतियों वाली पहाड़ियों को जब आप दूर से देखते हैं, तो ऐसा आभास होता है मानो चांद खुद ज़मीन पर उतर आया हो। यही वजह है कि घुमक्कड़ों और पर्यटकों के बीच यह खूबसूरत इलाका ‘लामायुरू मूनलैंड’ के नाम से जाना जाता है।
कुदरत की अनूठी कलाकारी और झील से बने मूनलैंड का सच
लामायुरू की पहाड़ियों की बनावट बाकी पहाड़ी इलाकों से बिल्कुल जुदा है। यहां चट्टानों में गहरे कटाव, गोल आकृतियां और छोटी-बड़ी सूखी घाटियां दिखाई देती हैं। सूरज की रोशनी जैसे-जैसे करवट बदलती है, इन पहाड़ियों का रंग भी सुबह से शाम तक बदलता हुआ महसूस होता है। भूवैज्ञानिकों और स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, प्राचीन काल में इस पूरी घाटी में एक विशाल झील हुआ करती थी। समय के साथ झील का पानी सूखता गया और हवा-पानी के प्राकृतिक क्षरण से मिट्टी और चट्टानों ने यह अद्भुत रूप अख्तियार कर लिया।
आध्यात्म की छांव: 11वीं सदी का ऐतिहासिक युरु गोम्पा
लामायुरू की पहचान सिर्फ इसकी चांद जैसी पहाड़ियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व भी बेहद गहरा है। पहाड़ियों के शीर्ष पर बना लामायुरू मठ (युरु गोम्पा) बौद्ध धर्म के द्रिकुंग काग्यू संप्रदाय का एक प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि 11वीं सदी में प्रसिद्ध बौद्ध योगी नारोपा ने इस जगह पर वर्षों कठोर साधना की थी। मठ का शांत और पवित्र माहौल, पुरानी स्थापत्य कला और यहां से दिखने वाला पूरी घाटी का विहंगम दृश्य पर्यटकों को एक असीम शांति का अहसास कराता है।
अगर आप लद्दाख की जीवंत परंपराओं को करीब से देखना चाहते हैं, तो लामायुरू का सालाना धार्मिक उत्सव ‘युरु कबग्यात’ सबसे सही मौका है। इस दौरान बौद्ध भिक्षु पारंपरिक पोशाक और रंग-बिरंगे मुखौटे पहनकर पवित्र ‘छम नृत्य’ करते हैं, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से लोग खिंचे चले आते हैं।
यात्रा का सही समय और कैसे पहुंचे लामायुरू?
लामायुरू की यात्रा के लिए मई से सितंबर का समय सबसे मुफीद माना जाता है, जब मौसम सुहावना रहता है और सड़कें पूरी तरह खुली होती हैं। लेह के कुशोक बकुला रिम्पोछे एयरपोर्ट पर उतरने के बाद टैक्सी या बाइक किराए पर लेकर 115 से 125 किलोमीटर का सुहाना सफर तय करके आसानी से लामायुरू पहुंचा जा सकता है।
अत्यधिक ऊंचाई पर होने के कारण यात्रियों को सलाह दी जाती है कि लेह पहुंचने पर कम से कम 24 से 36 घंटे आराम (एक्लिमेटाइजेशन) जरूर करें, ताकि शरीर ऊंचाई के माहौल में ढल सके।
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