Diljit Dosanjh Satluj Movie: ‘सतलुज’ अब हरियाणा – पंजाब के गुरुद्वारों में फ्री दिखाई जाएगी, ओटीटी से बैन दिलजीत की ‘सतलुज’
दिलजीत की फिल्म 'सतलुज' को लेकर केंद्र की चिंता और पंजाब में विरोध की पूरी इनसाइड स्टोरी
Diljit Dosanjh Satluj Movie: डिजिटल प्लेटफॉर्म और सेंसरशिप की बंदिशों को धता बताते हुए पंजाब में एक नया सिनेमाई आंदोलन करवट ले रहा है। मशहूर अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ की मुख्य भूमिका वाली फिल्म ‘सतलुज’ को भले ही ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया हो, लेकिन पंजाब के गुरुद्वारों ने अब इस फिल्म को सीधे जनता तक पहुंचाने का जिम्मा संभाल लिया है।
इसकी शुरुआत गुरदासपुर और मोगा के गुरुद्वारों से हो चुकी है, जहां बाकायदा लाउडस्पीकर से अनाउंसमेंट कर ग्रामीणों को यह फिल्म दिखाई गई। अब पठानकोट के दो प्रमुख गुरुद्वारों— गुरुद्वारा सिंह सभा (मॉडल टाउन) और गुरुद्वारा सिंह सभा सेंट्रल (रानीपुर) में भी बुधवार और गुरुवार को इसकी विशेष स्क्रीनिंग का ऐलान किया गया है।
जसवंत सिंह खालड़ा का इतिहास दबाने का आरोप
पठानकोट के गुरुद्वारा प्रबंधक मनप्रीत सिंह का कहना है कि यह फिल्म कोई साधारण मनोरंजन नहीं, बल्कि पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता भाई जसवंत सिंह खालड़ा के उस ऐतिहासिक संघर्ष की गाथा है, जिसे दबाने की कोशिश की जा रही है। उनका आरोप है कि पंजाब के इतिहास के एक बेहद दर्दनाक और अहम अध्याय को नई पीढ़ी से छुपाने के लिए ही फिल्म को डिजिटल दुनिया से गायब किया गया।
इस बीच, भारतीय किसान यूनियन के पंजाब यूथ अध्यक्ष इंद्रपाल सिंह बैंस ने साफ कर दिया है कि वे इस फिल्म को सूबे के हर जिले और गांव-गांव तक लेकर जाएंगे। वहीं, कानूनी पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विशाल कोहली ने कहा कि गुरुद्वारों में संगत के लिए इस तरह की स्क्रीनिंग करना किसी कानून का उल्लंघन नहीं है, क्योंकि यह सामग्री पहले से ही विभिन्न ऑनलाइन माध्यमों पर मौजूद है और इसे सामाजिक जागरूकता का हिस्सा माना जा सकता है।
क्या है फिल्म की वो कहानी, जिस पर केंद्र को है ऐतराज?
फिल्म ‘सतलुज’ की पृष्ठभूमि पंजाब के उस दौर की है जब आतंकवाद को कुचलने के नाम पर खाकी को असीमित अधिकार मिले हुए थे। फिल्म में 31 अगस्त 1995 को तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की बम धमाके में हुई हत्या और उसके ठीक एक हफ्ते बाद, 6 सितंबर 1995 को जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण की कड़ियों को जोड़ा गया है। फिल्म दिखाती है कि कैसे पुलिस को डर था कि लावारिस लाशों के नाम पर किए गए 25 हजार कथित फर्जी एनकाउंटरों का काला राज खालड़ा दुनिया के सामने न ला दें।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार की मुख्य चिंता राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर है। खुफिया एजेंसियों को अंदेशा है कि फिल्म के कुछ संवेदनशील दृश्यों का भारत विरोधी ताकतें दुरुपयोग कर सकती हैं और पंजाब चुनाव से ठीक पहले खालिस्तान समर्थक आंदोलन के पक्ष में माहौल गरमाया जा सकता है। हालांकि, भाजपा के पंजाब प्रधान केवल सिंह ढिल्लों की मध्यस्थता के बाद केंद्र ने इस पर एक रिव्यू कमेटी बनाई है, जो फिल्म के तथ्यों का दोबारा अध्ययन कर रही है।
कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा? बैंक की नौकरी छोड़ खोजा था ‘शमशानों का सच’
1952 में अमृतसर के खालड़ा गांव में जन्मे जसवंत सिंह खालड़ा पेशे से एक बैंक कर्मचारी थे और शिरोमणि अकाली दल की मानवाधिकार विंग के महासचिव भी थे। 90 के दशक में जब तत्कालीन डीजीपी केपीएस गिल के नेतृत्व में एंटी-टेररिज्म ऑपरेशन चल रहा था, तब राज्य से हजारों नौजवान रातोंरात गायब हो रहे थे। डेथ सर्टिफिकेट न होने के कारण उन परिवारों के बैंक खाते और संपत्तियां फ्रीज थीं।
खालड़ा ने अमृतसर, पट्टी और तरनतारन के शमशान घाटों का रिकॉर्ड खंगालना शुरू किया और जून 1995 में एक सनसनीखेज प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दावा किया कि पुलिस ने पहचान छिपाकर 25,000 से ज्यादा युवाओं की अवैध रूप से हत्या की और उन्हें लावारिस बताकर जला दिया। इस खुलासे के बाद तत्कालीन डीजीपी गिल ने दावों को खारिज किया, जिसके कुछ ही दिनों बाद 6 सितंबर 1995 को अमृतसर में अपने घर के बाहर कार धोते समय खालड़ा का अपहरण कर लिया गया।
सीबीआई जांच और एसपीओ की गवाही जिसने पुलिस अफसरों को दिलाई उम्रकैद
जसवंत सिंह खालड़ा की गुमशुदगी के बाद उनकी पत्नी परमजीत कौर की कानूनी लड़ाई के कारण मामला सीबीआई (CBI) को सौंपा गया। इस केस का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बने स्पेशल पुलिस ऑफिसर (SPO) कुलदीप सिंह, जो उस झबाल थाने में तैनात थे जहां खालड़ा को बंधक बनाया गया था। कुलदीप सिंह ने गवाही दी कि कैसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने खालड़ा को प्रताड़ित किया और अंततः दो गोलियां मारकर उनकी हत्या कर दी गई, जिसके बाद शव को हरीके पत्तन के पास नहर में फेंक दिया गया।
सीबीआई की इस पुख्ता जांच के आधार पर कोर्ट ने पंजाब पुलिस के कई बड़े अधिकारियों— सुरिंदर पाल सिंह, जसबीर सिंह, सतनाम सिंह और प्रिथीपाल सिंह को उम्रकैद की सजा सुनाई, जिसकी पुष्टि 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने भी की। सीबीआई ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में शीर्ष अदालत को माना था कि पंजाब के केवल तीन श्मशानों में ही 2097 शवों का गैर-कानूनी तरीके से अंतिम संस्कार किया गया था। अब यही इतिहास पंजाब की गलियों में गुरुद्वारों के जरिए परदे पर लौट रहा है।
यह भी पढ़ें – Diljit Dosanjh Satluj: जसवंत सिंह खालरा की बायोपिक ‘सतलुज’ पर बड़ा एक्शन, ZEE5 से हटी
