Panipat News: आज के दौर में भौतिकतावाद इस कदर हावी हो चुका है कि खून के रिश्ते भी महज कागजी औपचारिकता बनकर रह गए हैं। हरियाणा के पानीपत से एक ऐसा ही झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जिसने इंसानियत, संवेदनाओं और माता-पिता के प्रति बच्चों के कर्तव्यों पर बहुत बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। एक बुजुर्ग की मौत के बाद जब उनके अपनों ने ही अंतिम संस्कार में आने से मुंह मोड़ लिया, तो समाजसेवियों ने आगे आकर मानवता की मिसाल पेश की।
मध्य प्रदेश के जिला सिंगरौली के रहने वाले लगभग 65 वर्षीय सुशील कुमार सिंह पानीपत के ददलाना गांव में टाउनशिप के सामने राधा स्वामी कॉलोनी में रहते थे और पहले एक रिफाइनरी में नौकरी करते थे। अचानक सीने में तेज दर्द उठने के कारण उनकी असामयिक मृत्यु हो गई। कॉलोनी के लोगों ने जब इसकी सूचना पुलिस को दी, तो पुलिस ने शव को सिविल अस्पताल की मोर्चरी में रखवाया और परिजनों से संपर्क साधकर पानीपत पहुंचने की बात कही। लेकिन परिवार की तरफ से जो जवाब मिला, उसने पुलिस और स्थानीय लोगों को भी स्तब्ध कर दिया।
‘हम बहुत दूर हैं, नहीं आ सकते’ — बेटियों और दामादों का उदासीन रवैया
पुलिस के सूचना देने पर परिजनों की तरफ से दो टूक कह दिया गया कि वे बहुत दूर रहते हैं, इसलिए पानीपत नहीं आ सकते। इसके बाद पुलिस ने औपचारिकताएं पूरी कर शव जनसेवा दल को अंतिम संस्कार के लिए सौंप दिया। जनसेवा दल के सचिव चमन गुलाटी ने जब परिवार से दोबारा संपर्क किया, तो पता चला कि सुशील कुमार की पांच बेटियां हैं, जिनमें से तीन की शादी हो चुकी है और दो अविवाहित हैं, जबकि उनकी पत्नी बीमार रहती हैं।
चमन गुलाटी ने बेटियों को यहां तक भरोसा दिलाया कि वे पानीपत आ जाएं, आने-जाने का सारा किराया जनसेवा दल वहन करेगा। इसके बावजूद बेटियों ने आने में पूरी तरह असमर्थता जताई। जब उनसे अपने चाचा, मामा या अन्य रिश्तेदारों से संपर्क करने को कहा गया, तो वहां से भी कोई आगे नहीं आया। बेंगलुरु में रहने वाले एक दामाद से संपर्क किया गया, तो उसने भी व्यस्तता का हवाला देकर आने से इनकार कर दिया। अंत में परिवार ने अजीबोगरीब और संवेदनहीन मांग रखते हुए कहा कि आप लोग अंतिम संस्कार कर दीजिए और हमें वीडियो कॉल पर दिखा दीजिए।
वीडियो कॉल पर नम हुईं आंखें, अस्थियां लेने से भी किया इनकार
परिवार की जिद और बेरुखी के आगे मजबूर होकर जनसेवा दल ने वीडियो कॉल के जरिए ही बेटियों को उनके पिता की अंतिम विदाई और मुखाग्नि की प्रक्रिया दिखाई। स्क्रीन पर पिता का अंतिम संस्कार देख कुछ बेटियों की आंखें जरूर नम हुईं, लेकिन अपनों का यह दर्द सिर्फ डिजिटल स्क्रीन तक ही सीमित रह गया।
हैरानी की इंतहा तब हो गई जब संस्कार के बाद जनसेवा दल ने परिवार से पूछा कि क्या वे पिता की अस्थियां लेने आएंगे? इस पर भी साफ जवाब मिला कि आप लोग ही हरिद्वार में अस्थियां विसर्जित कर दीजिए, हम नहीं आ पाएंगे।
“क्या रिश्तों से बढ़कर हो गई है दूरी और पैसा?” — समाजसेवियों का छलका दर्द
इस पूरी घटना से आहत जनसेवा दल के सचिव चमन गुलाटी ने बेहद भावुक होते हुए समाज के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा कि हम परमात्मा से संतान की कामना इसलिए करते हैं कि जीवन के अंतिम पड़ाव में वे हमारा सहारा बनें। जिस पिता ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के भविष्य को संवारने में लगा दी, क्या आज उनके अंतिम संस्कार के लिए भी परिवार के पास चंद घंटे का वक्त नहीं है? यदि किसी परिवार में कोई नालायक बेटा भी हो, तब भी लोग उसके अंतिम विदाई में शामिल होने की कोशिश करते हैं, फिर माता-पिता के प्रति ऐसी क्रूर बेरुखी क्यों?
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि कई बार लोग किसी अप्रिय घटना के बाद मुआवजे या संपत्ति के लिए दौड़ते नजर आते हैं, लेकिन क्या इंसान और माता-पिता के सम्मान की कीमत सिर्फ पैसों से आंकी जा सकती है?
बहरहाल, अपनों के ठुकराए जाने के बाद भी इंसानियत जिंदा रही। जनसेवा दल ने यह साबित कर दिया कि बेसहारा और अनाथ हो चुके लोगों का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान और विधि-विधान से होना चाहिए। इस मानवीय और पुण्य के कार्य में किशन मनचंदा, चमन गुलाटी, कमल गुलाटी, समाजसेवी सतीश चुघ, बंटी गांधी, वासुदेव और युवा समाजसेवी मदन साइकिल वाले ने मिलकर दिवंगत सुशील कुमार सिंह का अंतिम संस्कार पूरी श्रद्धा के साथ संपन्न कराया।
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