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सोनिया गांधी का खुलासा: राहुल-प्रियंका भी नहीं चाहते थे कि मैं प्रधानमंत्री बनूं

Political News सोनिया गांधी का खुलासा: राहुल-प्रियंका भी नहीं चाहते थे कि मैं प्रधानमंत्री बनूं

इमरजेंसी पर सोनिया गांधी का बयान

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VVinita Kohli

Political News: कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने 2004 में प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं करने के अपने फैसले को लेकर बड़ा खुलासा किया है। अपनी आने वाली किताब ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव’ में उन्होंने बताया है कि उस समय उनके बेटे राहुल गांधी और बेटी प्रियंका गांधी भी नहीं चाहते थे कि वह देश की प्रधानमंत्री बनें। 10 नवंबर को लॉन्च होने वाली इस किताब को लेकर सोनिया गांधी ने ‘द हिंदू’ को दिए इंटरव्यू में अपने निजी जीवन, राजीव गांधी के साथ रिश्ते, इमरजेंसी और भारतीय राजनीति पर विस्तार से बात की है।

सोनिया गांधी ने कहा कि लंबे समय तक दूसरे लोग उनकी कहानी लिखते और बताते रहे, लेकिन अब उन्हें लगा कि अपनी जिंदगी के अनुभव खुद साझा करने चाहिए। उन्होंने बताया कि राजीव गांधी से मुलाकात के करीब 60 साल बाद भी उनके व्यक्तित्व में बहुत कुछ वैसा ही है। हालांकि, अब वह पहले की तरह मुस्कुराती और हंसती नहीं हैं। सोनिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत को लेकर अपनी सोच के बीच अंतर का भी जिक्र किया। उन्होंने पिछले 12 वर्षों में देश के लोकतंत्र और संस्थाओं को हुए नुकसान पर चिंता जताई। उनके मुताबिक, भारत को लेकर उनकी और प्रधानमंत्री मोदी की सोच एक-दूसरे से अलग है।

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राहुल-प्रियंका भी नहीं चाहते थे कि प्रधानमंत्री बनूं

2004 में प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं करने का फैसला सोनिया गांधी के राजनीतिक जीवन के सबसे चर्चित फैसलों में गिना जाता है। इस बारे में पूछे जाने पर उन्होंने अपनी किताब और इंटरव्यू के जरिए परिवार की भूमिका का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि राहुल और प्रियंका गांधी भी नहीं चाहते थे कि वह प्रधानमंत्री बनें। सोनिया गांधी ने अपने संस्मरण को सिर्फ राजनीतिक घटनाओं का लेखा-जोखा नहीं बताया है। उनके अनुसार, ‘बिलॉन्गिंग’ राजीव गांधी के साथ उनकी प्रेम कहानी के साथ-साथ उस परिवार और देश से जुड़ने की कहानी भी है, जिससे राजीव का गहरा रिश्ता था। उन्होंने कहा कि जब वह भारत आई थीं, तब उन्हें इस देश के बारे में बहुत कम जानकारी थी। राजीव गांधी और इंदिरा गांधी से उन्होंने भारत को समझना सीखा। दोनों की हिम्मत, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत में विश्वास तथा जिम्मेदारियों को निभाने का जज्बा उनके लिए प्रेरणा बना। सोनिया के मुताबिक, परिवार के प्रति लगाव और देश से जुड़ाव ने ही उन्हें सार्वजनिक जीवन में आने के लिए प्रेरित किया। जब उन्हें लगा कि उन लोगों के बलिदानों का उद्देश्य खतरे में पड़ रहा है और कांग्रेस पार्टी कमजोर हो रही है, तब उन्होंने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने का फैसला किया।

सोनिया गांधी ने बताया कि उन्होंने इस किताब पर काम करीब एक दशक पहले शुरू किया था। हालांकि, गंभीरता से लिखना लगभग पांच साल पहले शुरू किया। लेखन का यह सिलसिला लगातार नहीं चला। कभी विचार और शब्द आसानी से आते थे, तो कभी लिखना मुश्किल हो जाता था। ऐसे समय में वह निराश होकर लिखना रोक देती थीं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनके जीवन पर इतनी किताबें लिखी जा चुकी हैं। इंटरव्यू में जब उन्हें बताया गया कि उनके जीवन पर कम से कम 75 किताबें लिखी जा चुकी हैं, तो उन्होंने हैरानी जताई। सोनिया ने कहा कि उन्होंने कभी अपने बारे में लिखी किताबें पढ़ने की इच्छा महसूस नहीं की। राजीव गांधी और उन्होंने बहुत पहले समझ लिया था कि उनके बारे में लिखी जा रही हर बात को पढ़ते रहना व्यर्थ है।

इमरजेंसी पर बोलीं- संजय गांधी अकेले जिम्मेदार नहीं थे

इमरजेंसी के दौर को याद करते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि उस समय हो रही घटनाओं और उनकी गंभीरता का पता उन्हें आपातकाल खत्म होने के बाद चला। उन्होंने माना कि उस दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश लगाया गया था और बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी Habeas Corpus के अधिकार को निलंबित कर दिया गया था। सोनिया ने कहा कि इमरजेंसी की ज्यादतियों के लिए सिर्फ संजय गांधी जिम्मेदार नहीं थे, भले ही आम लोगों के बीच अक्सर उनका नाम उस दौर का पर्याय बन गया हो। उनके मुताबिक, इंदिरा गांधी पर उनके कुछ वरिष्ठ सहयोगियों का भी काफी दबाव था।

उन्होंने यह भी बताया कि राजीव गांधी आपातकाल के दौरान हो रही ज्यादतियों की शिकायतें इंदिरा गांधी तक पहुंचाते थे। सोनिया ने उस समय की परिस्थितियों को इंदिरा गांधी के नजरिए से देखने की कोशिश करते हुए कहा कि वह तेजी से बिगड़ते हालात से निपटने के लिए संघर्ष कर रही थीं। सोनिया गांधी की इस किताब में निजी जीवन और राजनीतिक सफर के कई पहलुओं को जगह दी गई है। 2004 में प्रधानमंत्री पद ठुकराने के फैसले से लेकर राजीव गांधी के साथ उनके रिश्ते और इमरजेंसी के अनुभवों तक, उनके बयान उस दौर की घटनाओं पर उनका व्यक्तिगत नजरिया सामने रखते हैं।

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