Kurukshetra News: भैंस के बछड़े और कुत्ते के चक्कर में 30 साल तक चला केस, 22 की उम्र में किया हमला, 56 की उम्र में आया फैसला!

भैंस के बछड़े और कुत्ते के चक्कर में 30 साल तक चला केस, 22 की उम्र में किया हमला, 56 की उम्र में आया फैसला!
Kurukshetra News: कहावत है कि गांवों में कई बार बेहद छोटी-छोटी बातें भी जिंदगी भर की दुश्मनी का सबब बन जाती हैं। ऐसा ही एक अजीबो-गरीब मामला कुरुक्षेत्र जिले के पिहोवा से सामने आया है, जहां भैंस के बछड़ा देने के बाद उसके पास पड़ोसी के कुत्ते के पहुंचने को लेकर छिड़ी जंग करीब तीन दशक बाद पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के दरवाजे पर आकर शांत हुई।
हाई कोर्ट ने 1996 के इस हमले के मामले में दो आरोपियों की दोषसिद्धि (कॉन्विंक्शन) को सही ठहराया है। हालांकि, करीब 18 वर्षों से लंबित पुनरीक्षण याचिका (रिविजन पिटीशन), घटना के बाद बीते लंबे समय और आरोपियों की वर्तमान उम्र को देखते हुए कोर्ट ने उनकी जेल की सजा को पहले से भुगती जा चुकी अवधि तक ही सीमित कर दिया है।
12 अक्टूबर 1996 की वो सुबह, जब कुत्ते पर टोका-टोकी बनी खूनी संघर्ष की वजह
यह पूरी घटना कुरुक्षेत्र के पिहोवा थाना क्षेत्र की है। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, 12 अक्टूबर 1996 की सुबह शिकायतकर्ता ओम प्रकाश की भैंस ने एक बछड़े को जन्म दिया था। भैंस की जेर लटक रही थी, जिसे पड़ोसी लाभ सिंह का पालतू कुत्ता खाने लगा। ओम प्रकाश ने कुत्ते को वहां से हटाने की कोशिश की, लेकिन विवाद नहीं सुलझा।
दोपहर करीब 1 बजे जब ओम प्रकाश खेत से धान कटवाकर लौटा, तो उसकी मां ने पड़ोसी राजू और देवा से दोबारा अपने कुत्ते को बांधकर रखने की गुजारिश की। इसी बात पर दोनों आरोपी आपा खो बैठे।
आरोप था कि राजू हाथ में गंडासी और देवा लाठी लेकर ओम प्रकाश के घर में घुस आए और पूरे परिवार को सबक सिखाने की धमकी दी। राजू ने गंडासी से सीधे ओम प्रकाश पर हमला किया, जिसे रोकते वक्त गंडासी उसके बाएं हाथ पर लगी। इसके बाद देवा ने लाठी से ओम प्रकाश की टांगों पर वार किया। लहूलुहान हालत में ओम प्रकाश को अस्पताल ले जाया गया, जहां एक्स-रे रिपोर्ट में उसके हाथ में गंभीर फ्रैक्चर की पुष्टि हुई। इसके बाद मामले में पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की कड़ी धारा 326 भी जोड़ दी थी।
2006 में निचली अदालत ने सुनाई थी 3 साल की सजा, 2008 में हाई कोर्ट पहुंचा मामला
मामले की सुनवाई करते हुए वर्ष 2006 में ट्रायल कोर्ट ने राजू और देवा को दोषी ठहराते हुए धारा 323/34 के तहत 3 महीने और धारा 326/34 के तहत 3 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद वर्ष 2008 में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (अडीशनल सेशंस जज) ने भी आरोपियों की अपील खारिज कर दी, जिसके बाद आरोपियों ने सजा से राहत के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
52 और 56 की उम्र में पहुंचे आरोपी, जस्टिस मनदीप पन्नू ने दिया मानवीय फैसला
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान आरोपियों के वकील ने दोषसिद्धि को चुनौती न देते हुए केवल सजा की अवधि कम करने (Leniency in Sentence) की गुहार लगाई। अदालत ने रिकॉर्ड खंगालने पर पाया कि आरोपी राजू 2 महीने 7 दिन और देवा 1 महीने 25 दिन पहले ही सलाखों के पीछे काट चुके हैं। जब 1996 में यह वारदात हुई थी, तब दोनों आरोपियों की उम्र महज 22 और 26 साल की थी, जबकि आज वे 52 और 56 साल के अधेड़ हो चुके हैं।
मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस मनदीप पन्नू ने अपने फैसले में कहा कि निचली अदालत द्वारा तय की गई दोषसिद्धि में किसी तरह के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि दोनों आरोपी पिछले करीब 28-30 सालों से अदालत और मुकदमों का संताप झेल रहे हैं।
ऐसे में उनकी वर्तमान उम्र और सुधरने के मौके को देखते हुए जेल की मूल सजा को पहले से भुगती जा चुकी अवधि (Already Undergone Period) तक सीमित करना ही न्यायसंगत होगा। अदालत ने निर्देश दिया कि दोनों आरोपियों द्वारा जमा कराया गया कुल 4,250-4,250 रुपये का जुर्माना पीड़ित ओम प्रकाश को मुआवजे के तौर पर सौंप दिया जाए।
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