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Thought Of The Day: ‘सोने नहीं देते वो हैं असली सपने’, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के इस सुविचार में छिपा है सफलता का सबसे बड़ा राज

Thought Of The Day: 'सोने नहीं देते वो हैं असली सपने', डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के इस सुविचार में छिपा है सफलता का सबसे बड़ा राज

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के इस सुविचार में छिपा है सफलता का सबसे बड़ा राज

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GGaganpreet Kaur

Thought Of The Day: भारत के पूर्व राष्ट्रपति, महान वैज्ञानिक और ‘मिसाइल मैन’ के नाम से दुनिया भर में विख्यात डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जब भी जिक्र आता है, तो उनके सादे जीवन के साथ-साथ उनके ऊंचे और दूरदर्शी विचार सबसे पहले जेहन में कौंधते हैं. डॉ. कलाम ने देश को न सिर्फ परमाणु और मिसाइल शक्ति के मोर्चे पर आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि अपने ओजस्वी विचारों से करोड़ों युवाओं की सोई हुई चेतना को भी जगाने का काम किया.

उनका एक बेहद लोकप्रिय और कालजयी सुविचार है, “सपने वो नहीं जो हम सोते वक्त देखते हैं, सपने वो हैं जो हमें सोने नहीं देते।” यह महज चंद शब्दों का मेल नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा जीवन दर्शन है जो इंसान को उसकी सुख-सुविधाओं के दायरे (कंफर्ट जोन) से बाहर निकालकर कर्मपथ पर ढकेल देता है.

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बंद आंखों के ख्वाब महज कल्पना, खुली आंखों के संकल्प बदलते हैं इतिहास

डॉ. कलाम के इस विचार की गहराई को अगर आज के संदर्भ में समझें, तो यह इंसानी मनोविज्ञान की एक बड़ी सच्चाई को उजागर करता है. सोते समय जो सपने हमारी आंखों के सामने आते हैं, उन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता और सुबह उठते ही वे धुंधले पड़ जाते हैं. वह सिर्फ एक तात्कालिक सुख या कल्पना मात्र होते हैं.

इसके विपरीत, असली सपने वह हैं जो हमारी खुली आंखों के सामने एक ठोस लक्ष्य बनकर खड़े हो जाते हैं. जब कोई इंसान जीवन में कुछ बड़ा हासिल करने का संकल्प ले लेता है, तो उसकी अंतरात्मा में एक ऐसी छटपटाहट पैदा होती है जो उसे चैन से बैठने नहीं देती. रातों की नींद उड़ने का मतलब यहां किसी बीमारी से नहीं, बल्कि उस लक्ष्य को पाने की दीवानगी और जुनून से है जो थकावट पर भी भारी पड़ती है.

आज के प्रतिस्पर्धी दौर में क्यों सबसे ज्यादा प्रासंगिक है ‘मिसाइल मैन’ का यह मंत्र?

साल 2026 के इस दौर में, जहां तकनीक, एआई और गलाकाट प्रतियोगिता के बीच युवा पीढ़ी अक्सर मानसिक तनाव और भटकाव का शिकार हो जाती है, वहां डॉ. कलाम की यह सीख एक मजबूत लाइटहाउस की तरह रास्ता दिखाती है. आज के युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती फोकस यानी एकाग्रता की है. अक्सर लोग बड़े-बड़े ख्वाब तो सजा लेते हैं,

लेकिन जब उनके लिए जमीनी स्तर पर संघर्ष करने और रात-रात भर जागकर पसीना बहाने की बारी आती है, तो कदम पीछे खींच लेते हैं. डॉ. कलाम खुद एक बेहद साधारण परिवार से निकलकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचे थे. उनका अपना जीवन इस बात का गवाह था कि अखबार बेचने वाले एक बच्चे की आंखों ने जब देश को विज्ञान की बुलंदियों पर ले जाने का सपना देखा, तो उस सपने ने उन्हें जीवन भर आराम से सोने नहीं दिया.

विचारों को हकीकत में बदलना ही डॉ. कलाम को सच्ची श्रद्धांजलि

अनुभव की कसौटी पर परखा जाए तो इतिहास गवाह है कि दुनिया में जितने भी क्रांतिकारी बदलाव हुए हैं या जिन्होंने भी बड़ी कामयाबी हासिल की है, उनके पीछे इसी तरह की एक ‘सकारात्मक बेचैनी’ काम कर रही थी. चाहे वह खेल का मैदान हो, विज्ञान की प्रयोगशाला हो या फिर कोई नया बिजनेस स्टार्टअप, कामयाबी हमेशा उन्हीं के कदम चूमती है जो अपने सपनों को अपनी सांसों में बसा लेते हैं.

डॉ. अब्दुल कलाम का यह विचार हमें याद दिलाता है कि अगर हमें अपने जीवन में या समाज में कोई वास्तविक बदलाव लाना है, तो हमें अपने लक्ष्यों के प्रति उतना ही वफादार और जुनूनी होना पड़ेगा. सोते हुए ख्वाब देखना छोड़िए, बल्कि एक ऐसा सपना पालिए जो आपको सुबह अलार्म बजने से पहले ही बिस्तर छोड़ने पर मजबूर कर दे.

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