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World Population Day: 5 अरब से शुरू हुई आबादी की कहानी अब कहां पहुंची, जानें इसका पूरा इतिहास

World Population Day: 5 अरब से शुरू हुई आबादी की कहानी अब कहां पहुंची, जानें इसका पूरा इतिहास

क्यों आज के दौर में और भी जरूरी हो गया है विश्व जनसंख्या दिवस

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GGaganpreet Kaur

World Population Day: आज 11 जुलाई है, यानी वह तारीख जिसे दुनिया ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ के रूप में जानती है. इस दिन को मनाने का मकसद सिर्फ यह बताना नहीं है कि धरती पर इंसानों की तादाद कितनी तेजी से बढ़ रही है, बल्कि इसके पीछे की असली चिंता उन सीमित संसाधनों को लेकर है जिनके भरोसे यह आबादी जिंदा है.

आज जब वैश्विक आबादी के आंकड़े नए रिकॉर्ड छू रहे हैं, तब रोजगार, साफ पानी, अनाज की उपलब्धता, स्वास्थ्य सेवाएं और सिर छिपाने के लिए छत जैसी बुनियादी जरूरतें एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हो गई हैं. ऐसे में यह दिन हमें एक जिम्मेदार समाज बनाने और आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों को बचाने की याद दिलाता है.

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इतिहास के पन्नों में 11 जुलाई: जब धरती पर गूंजी थी 5 अरबवें बच्चे की किलकारी

इस विशेष दिन को मनाने की कहानी करीब चार दशक पुरानी है. साल 1987 की 11 जुलाई को दुनिया की आबादी ने पहली बार 5 अरब (फाइव बिलियन) के जादुई और डराने वाले आंकड़े को पार किया था. संयुक्त राष्ट्र ने इस ऐतिहासिक दिन को ‘फाइव बिलियन डे’ का नाम दिया.

इसके बाद वैश्विक संस्थाओं को यह शिद्दत से महसूस हुआ कि अगर आबादी इसी रफ्तार से बढ़ती रही, तो दुनिया में भारी असंतुलन पैदा हो जाएगा. इसी बात को ध्यान में रखते हुए साल 1989 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की गवर्निंग काउंसिल ने हर साल 11 जुलाई को ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया, ताकि जनसंख्या नीति पर वैश्विक विमर्श को एक दिशा दी जा सके.

साल 2026 की थीम: युवाओं की उड़ान और उनके हक पर है पूरा फोकस

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) हर साल इस मौके पर एक नई थीम जारी करता है, जो वक्त की सबसे बड़ी जरूरत को बयां करती है. इस साल यानी 2026 के लिए ‘युवाओं की आशाओं और आकांक्षाओं को साकार करना – आज और बेहतर भविष्य के लिए’ थीम तय की गई है.

आज दुनिया के कई हिस्सों, विशेषकर भारत जैसे विकासशील देशों में युवाओं की एक बहुत बड़ी आबादी मौजूद है. यह थीम साफ तौर पर संदेश देती है कि यदि हम युवाओं को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार के समान अवसर नहीं देंगे, तो यह बड़ी आबादी एक वरदान बनने के बजाय देश और दुनिया के लिए एक बड़ी आर्थिक चुनौती में बदल सकती है.

बढ़ती आबादी और बदलते मौसम का खतरनाक कॉकटेल

अनुभव की कसौटी पर देखें तो आज जनसंख्या वृद्धि का सीधा कनेक्शन सीधे तौर पर पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन से जुड़ चुका है. अंधाधुंध शहरीकरण, जंगलों का कटना और कार्बन उत्सर्जन में बढ़ोतरी के पीछे कहीं न कहीं इंसानों की बढ़ती तादाद ही जिम्मेदार है. अगर समय रहते जिम्मेदार परिवार नियोजन, बेहतर प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं और लैंगिक समानता जैसे मोर्चों पर काम नहीं किया गया, तो आने वाले सालों में कई मुल्कों को भयंकर सामाजिक और आर्थिक संकट का सामना करना पड़ेगा.

आज के दिन दुनिया भर के स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संगठनों में सेमिनार और रैलियों के जरिए इसी जागरूकता की अलख जगाई जा रही है.

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