World Photography Day: वक्त को थाम लेने का हुनर, आज है वर्ल्ड फोटोग्राफी डे, जानिए इतिहास और शायरी का रिश्ता

वक्त को थाम लेने का हुनर, आज है वर्ल्ड फोटोग्राफी डे
World Photography Day: जिंदगी कब पलक झपकते ही अतीत बन जाती है, इसका अहसास हमें पुरानी एल्बम के पन्ने पलटने पर ही होता है। आज 19 अगस्त को दुनियाभर में ‘वर्ल्ड फोटोग्राफी डे’ मनाया जा रहा है। फोटोग्राफी केवल लेंस से क्लिक करने का नाम नहीं है, बल्कि यह किसी बहते हुए वक्त को हमेशा के लिए एक फ्रेम में कैद कर देने का जादुई हुनर है। आज के दिन यानी 1839 में फ्रांस की सरकार ने ‘डैगेरियोटाइप’ (Daguerreotype) फोटोग्राफी तकनीक को दुनिया के सामने आधिकारिक तौर पर अधिकृत किया था। इस क्रांतिकारी तकनीक के आविष्कारक फ्रांसीसी कलाकार और फोटोग्राफर लुई डागेर (Louis Daguerre) थे।
शुरुआती दौर में तस्वीरें खींचना किसी तपस्या से कम नहीं था। तब न तो जेब में आने वाले स्मार्टफोन हुआ करते थे और न ही पलक झपकते तस्वीर सेव होने का विकल्प। बड़े-बड़े और भारी कैमरे होते थे, जिनकी रासायनिक प्रक्रिया बेहद लंबी और जटिल हुआ करती थी। एक सिंगल फ्रेम को कैमरे में उतारने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता था। मगर तकनीक ने वक्त के साथ ऐसी करवट ली कि आज दुनिया का हर शख्स अपनी हथेली में एक पूरा स्टूडियो लेकर चल रहा है।
तसवीरें बोलती हैं, और शायर महसूस करते हैं
एक पुरानी तस्वीर हमें सीधे हमारे बचपन के आंगन में या बीते दौर के किसी कोने में छोड़ आती है। बच्चे की खिलखिलाहट हो या किसी वीराने का सन्नाटा, तस्वीर हर जज्बात को बिना कुछ कहे बयां कर देती है। यही वजह है कि साहित्य और शायरी की दुनिया में भी तस्वीर और अक्स का जिक्र बार-बार आता है। तस्वीरों की इसी गहराई को उस्ताद शायरों ने अपने अल्फाजों में कुछ यूं पिरोया है:
अज़हर इनायती का एहसास:
अपनी तस्वीर बनाओगे तो होगा एहसास
कितना दुश्वार है ख़ुद को कोई चेहरा देना
शकील बदायूनी का अंदाज़:
भेज दी तस्वीर अपनी उन को ये लिख कर ‘शकील’
आप की मर्ज़ी है चाहे जिस नज़र से देखिए
मुसव्विर की थकान बयां करता अज्ञात शेर:
लगता है कई रातों का जागा था मुसव्विर
तस्वीर की आंखों से थकन झांक रही है
नाज़िर वहीद के खामोश रंग:
रंग दरकार थे हम को तिरी ख़ामोशी के
एक आवाज़ की तस्वीर बनानी थी हमें
अख्तर सईद खान की तलाश:
आ कि मैं देख लूं खोया हुआ चेहरा अपना
मुझ से छुप कर मिरी तस्वीर बनाने वाले
इमाम बख्श नासिख का तसव्वुर:
तेरी सूरत से किसी की नहीं मिलती सूरत
हम जहाँ में तिरी तस्वीर लिए फिरते हैं
सालिम सलीम की गहराई:
अपने जैसी कोई तस्वीर बनानी थी मुझे
मिरे अंदर से सभी रंग तुम्हारे निकले
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