August 27, 2026

Toxic Movie Review: 3 घंटे 14 मिनट की लंबी फिल्म में छाए यश, लेकिन कहानी ने किया निराश

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Toxic Movie Review: 3 घंटे 14 मिनट की लंबी फिल्म में छाए यश, लेकिन कहानी ने किया निराश

3 घंटे 14 मिनट की लंबी फिल्म में छाए यश, लेकिन कहानी ने किया निराश

Toxic Movie Review: ‘केजीएफ चैप्टर 2’ की ऐतिहासिक सफलता के बाद जब कन्नड़ सुपरस्टार यश ने निर्देशक गीतू मोहनदास के साथ फिल्म ‘टॉक्सिक’ का ऐलान किया था, तभी से सिनेप्रेमियों की उम्मीदें सातवें आसमान पर थीं। गोवा की पृष्ठभूमि पर बनी अपराध, सत्ता, हिंसा और पारिवारिक रंजिशों के ताने-बाने में बुनी यह फिल्म आखिर सिनेमाघरों में आ चुकी है। यश का डबल रोल, विशाल कैनवास और नामचीन कलाकारों की फौज क्या पर्दे पर जादू चला पाती है या नहीं, आइए इस पर बेबाक चर्चा करते हैं।

दमदार विजुअल्स और यश का ‘मास’ अवतार: टॉक्सिक के प्लस पॉइंट्स

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत खुद यश हैं। शांत अंदाज में संवाद बोलने से लेकर खूंखार एक्शन सीन्स तक, यश ने पर्दे पर अपनी स्क्रीन प्रेजेंस से जान फूंक दी है। खासकर सेकेंड हाफ में उनके दूसरे किरदार की एंट्री दर्शकों के लिए असली सरप्राइज पैकेज साबित होती है। जो दर्शक थिएटर में सीटी और तालियां बजाने के लिए जाते हैं, उनके लिए यश की एक्टिंग और पैसा वसूल क्लाइमैक्स बेहतरीन अनुभव देगा।

तकनीकी मोर्चे पर फिल्म हॉलीवुड स्तर को छूती महसूस होती है। सिनेमैटोग्राफी, प्रॉडक्शन डिजाइन और बैकग्राउंड सेटिंग्स इतनी भव्य हैं कि हर फ्रेम विशाल नजर आता है। रवि बसरूर के निर्देशन में बने कुछ एक्शन सीन्स सिनेमाघरों में दर्शकों का दिल जीतने में पूरी तरह कामयाब रहते हैं।

उलझी कहानी और सुस्त रफ्तार: टॉक्सिक की कमजोर कड़ियां

फिल्म के सबसे बड़े नेगेटिव पॉइंट की बात करें तो इसका फर्स्ट हाफ बेहद बिखरा हुआ है। स्क्रीन पर कई कहानियां एक साथ चलती हैं, जिससे दर्शक स्क्रीन से खुद को कनेक्ट नहीं कर पाते। गीतू मोहनदास ने शुरुआती दौर में किरदारों को ठीक से स्थापित करने के बजाय कई घटनाओं को एक साथ परोस दिया, जिससे भ्रम पैदा होता है।

इसके साथ ही 3 घंटे 14 मिनट की अत्यधिक लंबाई दर्शकों के सब्र का इम्तिहान लेती है। जब कहानी एक सीधे ट्रैक पर न चले, तो इतनी लंबी अवधि स्क्रीन पर टिके रहना मुश्किल बना देती है। सबसे दुखद पहलू यह है कि यश इस फिल्म में भी अपनी ‘केजीएफ’ वाली छवि से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाए हैं। उनका स्वैग, स्लो-मोशन शॉट्स और संवाद बोलने का अंदाज बार-बार रॉकी भाई की याद दिलाता है।

सितारों का मेला, लेकिन किरदारों के साथ नहीं हुआ न्याय

कियारा आडवाणी और नयनतारा जैसी शीर्ष अभिनेत्रियों की मौजूदगी के बावजूद उनके किरदारों को बहुत सीमित जगह दी गई है। नयनतारा का रोल मजबूत है लेकिन यश के प्रभाव के आगे उनका चरित्र थोड़ा कमजोर पड़ जाता है। तारा सुतारिया, हुमा कुरैशी और रुक्मिणी वसंत जैसे प्रतिभाशाली कलाकार भी फिल्म का हिस्सा हैं, मगर कहानी में जगह न होने की वजह से उनके खाते में कुछ खास नहीं आया।

रवि बसरूर का संगीत इस बार वो जादू नहीं जगा पाया जो उन्होंने ‘केजीएफ’ में जगाया था। बैकग्राउंड स्कोर ठीक-ठाक है, लेकिन कुछ खास मौकों पर वह सीन को उठाने में नाकाम रहता है।

देखें या न देखें: हमारा अंतिम फैसला

अगर आप यश के कट्टर फैन हैं और बड़े पर्दे पर भव्य विजुअल्स, जोरदार एक्शन सीन्स और मास मोमेंट्स देखना पसंद करते हैं, तो ‘टॉक्सिक’ आपको निराश नहीं करेगी। लेकिन अगर आपकी प्राथमिकता एक मजबूत स्क्रिप्ट, सस्पेंस और इमोशनल बॉन्डिंग है, तो यह फिल्म आपको थोड़ी अधूरी लग सकती है। यह न तो पूरी तरह खराब फिल्म है और न ही बेहद शानदार; यह एक भव्य पैमानों पर बनी औसत से बेहतर क्राइम ड्रामा है।

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