Fatehabad News: 101 साल के स्वतंत्रता सेनानी नादर सिंह की दर्दभरी दास्तान, पेंशन के लिए हिसार DC दफ्तर पहुंचे आजाद हिंद फौज के सिपाही

101 साल के स्वतंत्रता सेनानी नादर सिंह की दर्दभरी दास्तान, पेंशन के लिए हिसार DC दफ्तर पहुंचे आजाद हिंद फौज के सिपाही
Fatehabad News: देश को आजाद कराने के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में कंधा मिलाकर लड़ने वाले एक बुजुर्ग को आज 101 साल की उम्र में अपने हक और सम्मान के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
हरियाणा के फतेहाबाद जिले के गांव हिजरावां कलां निवासी स्वतंत्रता सेनानी नादर सिंह पेंशन बनवाने की गुहार लेकर हिसार उपायुक्त (डीसी) कार्यालय पहुंचे। उम्र के इस ढलान पर भी आंखों में उम्मीद की चमक लिए नादर सिंह का कहना है कि वे सालों से फतेहाबाद में प्रयास कर रहे थे और अब इस उम्मीद से हिसार आए हैं कि यहां का प्रशासन उनकी बात सुनेगा। दरअसल, पहले फतेहाबाद जिला हिसार का ही हिस्सा हुआ करता था।
अलवर में टेंट की आग में राख हुए थे दस्तावेज, तब से जारी है कागजी जंग
नादर सिंह के बेटे स्वरूप सिंह ने अपने पिता के संघर्ष की आपबीती बताते हुए कहा कि उनके पिता ने देश की आजादी के लिए आजाद हिंद फौज में मुस्तैदी से लड़ाई लड़ी थी। बंटवारे के वक्त वे पाकिस्तान से हिंदुस्तान आए, जिसके बाद रिश्तेदार उन्हें राजस्थान के अलवर ले गए थे।
दुर्भाग्य से वहां उनके अस्थाई टेंट में भीषण आग लग गई, जिसमें नादर सिंह की सेना से जुड़ी डायरी, पहचान पत्र और तमाम जरूरी दस्तावेज जलकर खाक हो गए। उसी दिन से शुरू हुई खुद को स्वतंत्रता सेनानी साबित करने की जद्दोजहद आज तक खत्म नहीं हो सकी है।
शहीद स्मारक पर नाम के आगे लिख दिया था ‘स्वर्गीय’, खुद चलकर दिखाया था कि ‘मैं जिंदा हूं’
प्रशासनिक उपेक्षा और लापरवाही का आलम यह रहा कि करीब तीन साल पहले गांव में सरकारी योजना के तहत बनवाए गए स्वतंत्रता सेनानियों के स्मारक पट्टिका पर नादर सिंह के नाम के आगे ‘स्वर्गीय’ उकेर दिया गया।
101 वर्ष की उम्र में भी पूरी तरह चुस्त-दुरुस्त नादर सिंह जब इस स्मारक के पास पहुंचे, तो उन्होंने अधिकारियों को खुद पैदल चलकर दिखाया था कि वे अभी जिंदा हैं। इस गंभीर गलती से परिवार को गहरा आघात पहुंचा था। बाद में मामला तूल पकड़ने पर पंचायत और ग्रामीणों के हस्तक्षेप से पट्टिका से ‘स्वर्गीय’ शब्द को हटाया गया।
गांव के इकलौते जिंदा स्वतंत्रता सेनानी को कब मिलेगा इंसाफ?
गांव के सरपंच प्रतिनिधि करण सिंह के अनुसार, स्मारक का निर्माण पंचायत ने नहीं बल्कि प्रशासनिक योजना के तहत हुआ था, जहां नाम की छपाई में यह बड़ी चूक हुई थी जिसे बाद में सुधारा गया।
लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस देश में आजादी का जश्न बड़े धूमधाम से मनाया जाता है, उसी देश का एक शतकवीर योद्धा अपने वजूद के सबूत हाथ में लिए दर-दर क्यों भटक रहा है? हिसार डीसी कार्यालय पहुंचे नादर सिंह और उनके परिवार को उम्मीद है कि सरकार और प्रशासन इस बार कागजी पचड़ों से ऊपर उठकर उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का वाजिब हक और सम्मान जरूर देगा।
