October 2, 2026

Punjab High Court: 30 साल पुरानी स्वीपर-चौकीदार भर्ती रद्द करने से इनकार, याचिकाएं खारिज

0
Punjab High Court: 30 साल पुरानी स्वीपर-चौकीदार भर्ती रद्द करने से इनकार, याचिकाएं खारिज

16 साल तक कोर्ट में लटकी रही फाइल, हाईकोर्ट ने 1997 की पंजाब भर्ती पर सुनाया बड़ा फैसला

Punjab High Court Recruitment Case : पंजाब में वर्ष 1997 में हुई स्वीपर-कम-चौकीदार और अन्य चतुर्थ श्रेणी पदों की सरकारी भर्ती से जुड़ा विवाद पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में समाप्त हो गया है। जस्टिस संदीप मौदगिल की एकल पीठ ने करीब तीन दशक पुरानी चयन प्रक्रिया को रद्द करने और खुद को नियुक्ति देने की मांग करने वाले बूटा सिंह व अन्य की दो याचिकाओं को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बिना पुख्ता साक्ष्यों के केवल संदेह के आधार पर दशकों पुरानी नियुक्तियों को निरस्त नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि संबंधित कर्मचारी लगभग 30 वर्षों तक अपनी सेवाएं दे चुके हैं। चंडीगढ़ स्थित हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी कि इतने लंबे समय बाद भर्ती प्रक्रिया को दोबारा खोलने से प्रशासनिक और मानवीय स्तर पर भारी असंतुलन पैदा होगा।

याचिकाकर्ताओं के मनमानी के आरोप

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में तर्क दिया था कि चयन समिति ने 1997 की इस भर्ती में मनमाने तरीके से अपने चहेतों को चुना। उनका दावा था कि करीब 3000 अभ्यर्थियों का साक्षात्कार महज तीन दिनों में पूरा कर लिया गया, जिससे निष्पक्ष मूल्यांकन असंभव था।

याचिकाकर्ताओं में से एक ने यह भी कहा कि उसके पास 900 दिनों का कार्य अनुभव था, फिर भी कम योग्यता वाले अभ्यर्थियों का चयन कर लिया गया। याचिका में चयनित कर्मचारियों की उम्र और आवश्यक पात्रता पर भी सवाल खड़े किए गए थे।

पंजाब सरकार ने दी दलील

पंजाब सरकार ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए हाईकोर्ट के सामने आधिकारिक आंकड़े पेश किए। सरकारी वकील ने स्पष्ट किया कि साक्षात्कार में 3000 नहीं, बल्कि कुल 1442 अभ्यर्थी ही शामिल हुए थे।

सरकार के अनुसार, विभिन्न श्रेणियों और पदों के लिए गठित चयन समिति के सदस्यों ने अलग-अलग तिथियों पर उम्मीदवारों की योग्यता और प्रदर्शन को आंका था। समिति के सभी सदस्यों की आम सहमति और अंतिम अनुमोदन के बाद ही मेरिट सूची जारी की गई थी।

केवल संदेह पर रद्द नहीं हो सकती भर्ती

जस्टिस संदीप मौदगिल ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अदालत किसी चयन समिति के फैसले पर अपीलीय प्राधिकारी की तरह बैठकर उम्मीदवारों का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकती। याचिकाकर्ता पक्षपात या भाई-भतीजावाद साबित करने के लिए कोई दस्तावेजी या ठोस साक्ष्य पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं।

अदालत ने माना कि 1997 में नियुक्त हुए कई कर्मचारी अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, कई की मृत्यु हो चुकी है और कई पदोन्नति पाकर उच्च पदों पर कार्यरत हैं। ऐसे में इतने वर्षों बाद हस्तक्षेप करने से उन कर्मचारियों के अधिकार प्रभावित होंगे, जिनका इस विलंब में कोई दोष नहीं है।

16 साल फाइल लटकने पर जताई चिंता

हाईकोर्ट ने इस मामले के 16 वर्षों तक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध न होने पर भी सख्त रुख अपनाया। अदालत ने रिकॉर्ड पर लिया कि 13 जुलाई 2000 को इस मामले को एक वर्ष के भीतर सूचीबद्ध करने का आदेश दिया गया था, लेकिन रजिस्ट्री ने इसे 25 अप्रैल 2016 को पहली बार सुनवाई पर लगाया।

अदालत ने हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वे इस प्रक्रियागत विफलता की जांच करें। साथ ही न्यायिक आदेशों के पालन में आ रही खामियों को दूर करने के लिए ठोस संस्थागत तंत्र तैयार करने को कहा। #PunjabHighCourt #PunjabNews #LegalNews

Punjab Congress: राजा वड़िंग से छिनी प्रधानगी, विजय इंदर सिंगला बन सकते हैं नए अध्यक्ष

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed