Mohan Bhagwat: बिना कब्जा और धर्मांतरण किए भारत ने दुनिया को दिया ज्ञान, मुंबई में बोले संघ प्रमुख
मुंबई में ऑल इंडिया विहार सेवा सम्मेलन: RSS प्रमुख ने बताया राष्ट्र और धर्म का अटूट रिश्ता
Mohan Bhagwat Mumbai Speech : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शुक्रवार को मुंबई में स्पष्ट किया कि भारत में धर्म और राष्ट्र दो अलग-अलग संकल्पनाएं नहीं हैं। उन्होंने कहा कि हमारे राष्ट्र का मूल उद्देश्य धर्म है और धर्म ही इस राष्ट्र को मजबूती से बनाए रखने में आधार स्तंभ का काम करता है। भागवत ने आगाह करते हुए कहा कि यदि कभी धर्म पर संकट आया तो पूरे राष्ट्र को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ेगा, क्योंकि दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे से ही जुड़ा हुआ है।
आरएसएस प्रमुख मुंबई में आयोजित ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप के 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने रेखांकित किया कि आज पूरी दुनिया विकास और पर्यावरण संरक्षण तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारिवारिक जीवन के बीच सही संतुलन तलाशने के लिए संघर्ष कर रही है, जिसका समाधान केवल भारतीय चिंतन से ही संभव है।
धर्म और राष्ट्र एक-दूसरे के पूरक
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि राष्ट्र और धर्म एक सिक्के के दो पहलू हैं। अगर एक मौजूद है तो दूसरा भी सुरक्षित रहेगा, लेकिन यदि इनमें से एक भी कमजोर हुआ तो दूसरे का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
उन्होंने आगे कहा कि भारत का प्राचीन इतिहास और इसकी जीवन पद्धति इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि राष्ट्र निर्माण की नींव हमेशा सनातन मूल्यों और नैतिक आचरण पर टिकी रही है। धर्म का क्षरण सीधे तौर पर सामाजिक ताने-बाने और राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर करता है।
वैश्विक संकटों का समाधान भारत में
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि पूरी दुनिया आज विभिन्न तरह के मानसिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संकटों से घिरी हुई है। इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच दुनिया को सही दिशा देने का सामर्थ्य केवल भारत के पास मौजूद है।
उन्होंने याद दिलाया कि भारत ने कभी भी दूसरे देशों पर सैन्य कब्जा करने या लोगों का जबरन धर्म बदलने का प्रयास नहीं किया। इसके विपरीत, भारत ने युगों-युगों से अपने समृद्ध और सार्वभौमिक ज्ञान को बिना किसी स्वार्थ के पूरी मानवता के साथ साझा किया है।
भारत का विशाल आध्यात्मिक खजाना
भागवत ने कहा कि हमारे देश के पास वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता जैसी कालजयी ज्ञान परंपराएं हैं। इसके साथ ही जैन आगम, बौद्ध त्रिपिटक, श्री गुरु ग्रंथ साहिब और अनगिनत संतों की उच्च शिक्षाएं हमारी सांस्कृतिक पूंजी हैं।
उन्होंने कहा कि भक्ति की असीम शक्ति से ही मनुष्य ईश्वर और सत्य के सबसे करीब पहुंच सकता है। इस ज्ञान के विशाल खजाने की आवश्यकता आज समूचे विश्व को है, ताकि समाज में शांति और परस्पर सौहार्द बना रहे।
परंपराओं की रक्षा मानवता की सेवा
सरसंघचालक ने विहार सेवा से जुड़े कार्यकर्ताओं और संतों के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि इन समृद्ध आध्यात्मिक परंपराओं और ज्ञान को आगे बढ़ाने वाले लोगों के जीवन की रक्षा करना केवल एक सामान्य धार्मिक जिम्मेदारी नहीं है।
उन्होंने कहा कि यह वास्तव में पूरी मानवता की सबसे बड़ी सेवा है। ऐसे ज्ञान संवाहकों की रक्षा करके हम केवल किसी एक व्यक्ति को नहीं बचा रहे हैं, बल्कि समूची मानव जाति के सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की रक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं। #MohanBhagwat #RSS #MumbaiNews #Dharma #NationalNews
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