August 2, 2026

Dhadkai silent village: जम्मू-कश्मीर का धदकई गांव, जानिए क्यों इस खूबसूरत जगह को कहा जाता है ‘द साइलेंट विलेज ऑफ इंडिया’

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डोडा के धदकई गांव की अनोखी 'इशारों वाली भाषा' की इनसाइड स्टोरी

Dhadkai silent village: जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले की बर्फीली और खूबसूरत पहाड़ियों के बीच बसे धदकई गांव को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं, लेकिन इस गांव की हकीकत बेहद हैरान करने वाली है।

प्राकृतिक सुंदरता से सराबोर इस जगह को पूरी दुनिया ‘द साइलेंट विलेज ऑफ इंडिया’ के नाम से जानती है। इस गांव की सबसे बड़ी और अनोखी विशेषता यह है कि यहां सन्नाटा पसरा नहीं रहता, बल्कि यहां का सन्नाटा आपस में बातें करता है। दुर्गम रास्तों पर बसे इस गांव की आधी से ज्यादा आबादी जन्म से ही न तो सुन सकती है और न ही बोल सकती है।

खुद की ईजाद की अनोखी ‘साइन लैंग्वेज’

धदकई मुख्य रूप से अनुसूचित जनजाति के अंतर्गत आने वाले गुज्जर मुस्लिम समुदाय का गांव है। यहां रहने वाले करीब 105 परिवारों में से 55 से ज्यादा घर ऐसे हैं जहां खामोशी का राज है। कई घरों में तो सात में से छह बच्चे मूक-बधिर पैदा हुए हैं। इतनी बड़ी शारीरिक चुनौती के बावजूद यहां के बाशिंदों ने जिंदगी से हार नहीं मानी।

ग्रामीणों ने समय के साथ अपनी एक विशिष्ट ‘लोकल साइन लैंग्वेज’ यानी स्थानीय इशारों की भाषा तैयार कर ली है। दिलचस्प बात यह है कि गांव के जो लोग सामान्य हैं और बोल-सुन सकते हैं, वे भी इस कूट भाषा के उस्ताद हैं, जिससे पूरा गांव बिना किसी बाधा के आपस में सुख-दुख साझा कर लेता है।

भगवान का अभिशाप नहीं, मेडिकल साइंस का फेर

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि खामोशी का यह सिलसिला साल 1901 में फौजी गुज्जर नामक व्यक्ति के घर से शुरू हुआ था, जब उनका बेटा मूक-बधिर पैदा हुआ।

साल 1990 में यह संख्या 43 थी जो आज बढ़कर 90 के पार जा चुकी है, जिसमें पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या ज्यादा है। लंबे समय तक लोग इसे कुदरत का कहर या यहां के पानी का दोष मानते रहे, लेकिन जब वैज्ञानिकों ने ग्रामीणों के खून के सैंपल लिए तो चौंकाने वाली थ्योरी सामने आई। इसे मेडिकल की भाषा में ‘जेनेटिक क्लस्टर’ कहा जाता है।

करीबी रिश्तेदारों में शादी पड़ी भारी

जेनेटिक वैज्ञानिकों के अनुसार, इस बीमारी की जड़ सदियों पुरानी सामाजिक परंपरा में छिपी है। गुज्जर समुदाय के लोग अपने ही छोटे से कुनबे और करीबी रिश्तेदारों (जैसे चचेरे-ममेरे भाई-बहन) में शादियां करते आ रहे हैं।

इस ‘इनब्रीडिंग’ की वजह से उनके शरीर में मौजूद ‘OTOF’ (ओटोफर्लिन) नामक जीन गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गया है। यह जीन कान के अंदरूनी हिस्से से दिमाग तक आवाज के सिग्नल भेजने के लिए जिम्मेदार होता है। जब माता और पिता दोनों के डिफेक्टिव जीन बच्चे में ट्रांसफर होते हैं, तो बच्चा चाहकर भी सुन और बोल नहीं पाता।

कैसे टूटेगा खामोशी का यह चक्रव्यूह?

विशेषज्ञों का कहना है कि इस अनुवांशिक चक्रव्यूह को तोड़ने का एकमात्र व्यावहारिक रास्ता यही है कि गांव की नई पीढ़ी अपनी बिरादरी और करीबी रिश्तेदारों से बाहर (Out-marriage) शादियां करना शुरू करे।

इसके अलावा, शादी से पहले कपल्स के जेनेटिक रिस्क को मापने के लिए ‘कलर-कोडेड कार्ड्स’ बनाने की सलाह दी गई है। फिलहाल, भारतीय सेना और कुछ सामाजिक संस्थाओं ने यहां के युवाओं को ‘इंडियन साइन लैंग्वेज’ (ISL) सिखाकर आधुनिक शिक्षा और रोजगार की मुख्यधारा से जोड़ने की मुहिम शुरू की है, ताकि धदकई की वादियों में फिर से किलकारियां गूंज सकें।

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