Loneliness: “पास होकर भी दूर हैं लोग”, फ्लैट्स और पुरानी कॉलोनियों के रिश्तों पर सोशल मीडिया पर छिड़ी जंग

"पास होकर भी दूर हैं लोग", फ्लैट्स और पुरानी कॉलोनियों के रिश्तों पर सोशल मीडिया पर छिड़ी जंग
Loneliness: जगमगाती गगनचुंबी इमारतें, गेट पर तैनात गार्ड, क्लब हाउस, स्विमिंग पूल और चमचमाते पार्क—आज के शहरी भारत में हर कोई ऐसे ही हाईराइज अपार्टमेंट में रहने का सपना देखता है।
लेकिन क्या आधुनिक सुविधाओं से लैस ये बहुमंजिला इमारतें सचमुच हमें एक बेहतर समाज दे पा रही हैं? या फिर ये हमें और अधिक अकेला बना रही हैं? इन दिनों सोशल मीडिया पर अभय नाम के एक व्यक्ति का वीडियो इंटरनेट पर जबरदस्त तरीके से वायरल हो रहा है, जिसने बहुमंजिला सोसायटियों और पारंपरिक मोहल्लों के बीच के बदलते मानवीय रिश्तों पर एक नई बहस छेड़ दी है।
दीवारें पास, लेकिन दिल दूर: हाईराइज सोसायटियों का कड़वा सच
वायरल हो रहे वीडियो में अभय एक हाईराइज सोसाइटी की तरफ इशारा करते हुए बताते हैं कि बाहर से देखने पर ये इमारतें बहुत भव्य और आरामदायक नजर आती हैं। लेकिन इनकी असली हकीकत कुछ और ही है। उनके मुताबिक, एक ही फ्लोर पर रहने के बावजूद दो पड़ोसी महीनों तक एक-दूसरे से बात नहीं करते।
कई बार तो ऐसा होता है कि अगर पड़ोस के फ्लैट में कोई बड़ा संकट आ जाए, तो बगल में रहने वाले व्यक्ति को उसकी भनक तक नहीं लगती। लोग अपनी नौकरी, निजी जिंदगी और चारदीवारी के भीतर इतने व्यस्त हैं कि बिना जान-पहचान के किसी का हाल-चाल पूछने की फुर्सत भी किसी के पास नहीं है।
पुरानी कॉलोनियों में था अपनापन और सुख-दुख का साझा दायरा
अभय ने हाईराइज कल्चर की तुलना शहरों की पुरानी कॉलोनियों और मोहल्लों से की। उनका कहना है कि पुराने जमाने में या पारंपरिक बस्तियों में पड़ोसी का मतलब सिर्फ बगल में रहने वाला व्यक्ति नहीं होता था, बल्कि वह परिवार का एक हिसा बन जाता था।
किसी के घर में कोई बीमार हो या कोई शादी-ब्याह का अवसर, पूरा मोहल्ला बिना बुलाए मदद के लिए खड़ा हो जाता था। पुरानी गलियों में बच्चों का खेल और बुजुर्गों की चौपाल सामाजिक ताने-बाने को मजबूत बनाए रखती थी। लेकिन फ्लैट कल्चर में यह अपनापन कहीं गुम हो चुका है।
सुविधाओं के नाम पर क्या हम ‘अकेलेपन’ का सौदा कर रहे हैं?
वीडियो में अभय एक गहरा सवाल उठाते हैं—इन आधुनिक आवासीय परिसरों को हम ‘सोसाइटी’ (समाज) तो कहते हैं, लेकिन क्या यह सचमुच एक समाज जैसा व्यवहार करती हैं? उन्होंने तर्क दिया कि अक्सर झुग्गी-झोपड़ियों या छोटे मोहल्लों में रहने वाले लोग संसाधनों की कमी के बावजूद मानसिक रूप से ज्यादा खुश और जुड़े हुए नजर आते हैं। वहीं, चमचमाते फ्लैट्स में रहने वाले लोग डिप्रेशन और अकेलेपन से जूझ रहे हैं। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह उनका व्यक्तिगत नजरिया है और हर सोसाइटी का माहौल एक जैसा नहीं होता।
इंटरनेट पर छिड़ी तीखी बहस: यूजर्स की बंटी राय
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अभय का यह वीडियो सामने आते ही सोशल मीडिया यूजर्स दो हिस्सों में बंट गए हैं। बड़ी संख्या में लोगों ने उनकी बातों से सहमति जताई। एक यूजर ने लिखा, “बिल्कुल सच! आज हम 24 घंटे सुरक्षा के बीच रहते हैं, लेकिन सुख-दुख में कोई साथ खड़े होने वाला नहीं है।” वहीं दूसरी ओर, कई लोगों ने इस सोच को खारिज करते हुए कहा कि सोसायटियों में भी फेस्टिवल सेलिब्रेशन और क्लब एक्टिविटीज के जरिए लोग काफी करीब आ जाते हैं।
अनुभव चाहे जो भी हो, लेकिन इस वीडियो ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम आधुनिक सुविधाओं को पाने की होड़ में अपनी पुरानी सामाजिक और मानवीय जड़ों को खोते जा रहे हैं।
