Jind Sanji Art: आधुनिकता की चकाचौंध में जहां लोक परंपराएं धीरे-धीरे ओझल होती जा रही हैं, वहीं जींद के युवा कलाकार गौतम सत्यराज हरियाणवी संस्कृति की महक को देश-दुनिया तक पहुंचाने के मिशन में जुटे हैं। जींद के चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय (CRSU) में एमए फाइन आर्ट्स के छात्र गौतम ने इस बार 41 फीट लंबी और 30 फीट चौड़ी विशालकाय सांझी तैयार कर हर किसी को हैरान कर दिया है।
15 दिनों की अथक मेहनत, 70 हजार की लागत
इस अलौकिक और भव्य सांझी को आकार देने में गौतम को करीब 15 दिन का वक्त लगा। इसे तैयार करने में 2 ट्रॉली गाय का शुद्ध गोबर, 8 ट्रॉली काली मिट्टी और लगभग 70 हजार रुपये का खर्चा आया है। कला के इस महायज्ञ में गौतम का साथ उनके कॉलेज व यूनिवर्सिटी के साथियों के अलावा उनके परिवार ने भी बखूबी निभाया।
गौरतलब है कि गौतम सत्यराज वर्ष 2014 से ही सांझी कला के संरक्षण में लगे हैं। वे प्रदेश के लगभग हर जिले के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अपनी कला की प्रदर्शनी लगा चुके हैं। इससे पहले वे 2021 में 21 फीट और 2023 में 31 फीट की सांझी बनाकर ‘इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं। अब 41 फीट की इस नई कृति के साथ वे ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ और ‘लिम्का बुक’ में दावेदारी ठोकने जा रहे हैं।
नानी के हाथों से मिली प्रेरणा, संस्कृति सहेजने का लिया संकल्प
मूल रूप से गांव ढिगाणा के रहने वाले गौतम का जीवन संघर्षों से भरा रहा। महज ढाई साल की उम्र में सिर से मां का साया उठ जाने के बाद उनका पालन-पोषण जींद में उनकी नानी पातू देवी ने किया। बचपन में नानी को घर की दीवारों पर गोबर और मिट्टी से सांझी उकेरते देख गौतम के मन में इस कला के प्रति अनुराग जागा।
गौतम बताते हैं कि उनके पिता सत्यवान, भाई संजीव, भाभी कमला और बच्चे विश्वास, विशाल व लक्ष्मी इस सांस्कृतिक मुहिम में उनका पूरा साथ देते हैं। उनका सपना है कि गांव की दीवारों से सिमटती जा रही इस धरोहर को वैश्विक पटल पर जगह मिले।
हरियाणवी लोक जीवन और भाईचारे की प्रतीक है सांझी
हरियाणा में नवरात्र के दिनों में सांझी उकेरने की परंपरा सदियों पुरानी है। इसे मां दुर्गा व पार्वती का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, मनभावन और योग्य वर की प्राप्ति के लिए कुंवारी लड़कियां नवरात्रों में सांझी माता की पूजा-अर्चना करती हैं और व्रत रखती हैं। विजयदशमी यानी दशहरे के दिन इसे पूरे आदर-सत्कार के साथ जल में प्रवाहित किया जाता है।
एक दौर था जब सांझी केवल धार्मिक अनुष्ठान न होकर ग्रामीण भाईचारे की मिसाल हुआ करती थी। शाम ढलते ही गांव की बेटियां एक जगह जमा होकर सांझी के पारंपरिक लोकगीत गाया करती थीं। हालांकि, भागदौड़ भरी जिंदगी और शहरीकरण के कारण यह परंपरा गांवों में भी दम तोड़ती दिख रही है। ऐसे में गौतम सत्यराज जैसे युवाओं का यह प्रयास विलुप्त होती हरियाणवी विरासत को नई सांसें देने का काम कर रहा है।
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