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Kurukshetra News: कुरुक्षेत्र के ज्योतिसर तीर्थ पर ग्रामीणों की अनूठी सेवा, निर्जला एकादशी पर राहगीरों को पिलाया मीठा पानी

Kurukshetra News: कुरुक्षेत्र के ज्योतिसर तीर्थ पर ग्रामीणों की अनूठी सेवा, निर्जला एकादशी पर राहगीरों को पिलाया मीठा पानी

ज्योतिसर मुख्य द्वार पर सजी मीठे पानी की छबील

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AAmandeep Singh

Kurukshetra News ज्योतिसर (पवन शर्मा): ज्येष्ठ महीने की तपती धूप और चिलचिलाती गर्मी के बीच आज निर्जला एकादशी का पर्व पूरे देश सहित धर्मनगरी कुरुक्षेत्र में भी बड़े ही सेवा भाव के साथ मनाया जा रहा है।

इसी कड़ी में गीता स्थली के रूप में विश्व विख्यात ज्योतिसर तीर्थ के मुख्य द्वार पर सुबह से ही एक अलग ही रौनक देखने को मिली। गांव ज्योतिसर के वासियों ने एकजुट होकर तीर्थराज पर आने वाले श्रद्धालुओं और सैलानियों के लिए ठंडे, मीठे पानी की छबील लगाई। सुबह से शुरू हुआ जल सेवा का यह सिलसिला देर शाम तक अनवरत जारी रहा, जिसने इस भीषण मौसम में राहगीरों को बड़ी राहत पहुंचाई।

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सदियों पुरानी परंपरा को जिंदा रखे हैं ग्रामीण

छबील सेवा में जुटे स्थानीय ग्रामीण पुष्पेंद्र शर्मा ने बताया कि ज्योतिसर गांव की तरफ से हर साल निर्जला एकादशी पर छबील लगाने की यह परिपाटी बरसों से चली आ रही है।

उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति में जेठ के इस तपते महीने में किसी प्यासे कंठ को शीतल जल उपलब्ध कराने से बड़ा कोई दूसरा पुण्य नहीं है। इसी सेवा भावना के साथ गांव के युवा और बुजुर्ग मिलकर इस आयोजन को सफल बनाते हैं। तीर्थ पर माथा टेकने आए भक्तों ने भी ग्रामीणों की इस पहल की दिल खोलकर तारीफ की और इसे मानव सेवा का बेहतरीन उदाहरण बताया।

क्यों कहा जाता है इसे ‘भीमसेनी एकादशी’?

धार्मिक और आध्यात्मिक नजरिए से हिंदू कैलेंडर में आने वाली सभी 24 एकादशियों में निर्जला एकादशी को सबसे उत्तम और फलदायी माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में जब पांडवों में गदाधारी भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास से कहा कि वे भूख बर्दाश्त नहीं कर सकते और हर महीने दो व्रत रखना उनके बस की बात नहीं है, तब व्यास जी ने उन्हें वर्ष में केवल एक बार ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को बिना पानी पिए (निर्जल) व्रत रखने की सलाह दी थी।

इसी के बाद से इसे ‘भीमसेनी एकादशी’ या पांडव एकादशी भी कहा जाने लगा। मान्यता है कि मात्र इस एक व्रत को सच्चे मन से रखने पर सालभर की सभी एकादशियों का पुण्य मिल जाता है।

जलदान का महात्म्य और श्रद्धालुओं की दिनचर्या

शास्त्रों में इस दिन जल, शरबत, मौसमी फल, वस्त्र और छतरी जैसी ठंडी चीजों के दान को सर्वोत्तम माना गया है। यही वजह है कि आज के दिन जगह-जगह छबीलें लगाने की परंपरा है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर पवित्र सरोवरों में स्नान करते हैं और भगवान विष्णु व लक्ष्मी नारायण की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं।

दिनभर अन्न-जल का पूरी तरह त्याग कर निर्जल उपवास रखा जाता है और शाम को भजन-कीर्तन व विष्णु सहस्रनाम के पाठ के साथ समय बिताया जाता है। अगले दिन द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद ब्राह्मणों को सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा देकर ही व्रती अपना उपवास खोलते हैं।

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