August 2, 2026

Pehowa Temple: पिहोवा के श्री कृष्ण कृपा मंदिर में 30 साल से जारी है अन्न क्षेत्र, इस महीने 90 परिवारों को मिला राशन

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Pehowa Temple: पिहोवा के श्री कृष्ण कृपा मंदिर में 30 साल से जारी है अन्न क्षेत्र, इस महीने 90 परिवारों को मिला राशन

Pehowa Temple: पिहोवा के श्री कृष्ण कृपा मंदिर में 30 साल से जारी है अन्न क्षेत्र, इस महीने 90 परिवारों को मिला राशन

Pehowa Temple: पिहोवा (अभिषेक पूर्णिमा) कहते हैं कि परमात्मा की सबसे सच्ची इबादत किसी भूखे का पेट भरना और टूटते हुए हौसले को सहारा देना है। धर्मनगरी पिहोवा की पावन धरा पर स्थित श्री कृष्ण कृपा मंदिर पिछले लगभग 30 वर्षों से इस बात को पूरी शिद्दत से सच साबित कर रहा है। महामंडलेश्वर गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज के दिव्य मार्गदर्शन में शुरू हुआ ‘मासिक राशन वितरण’ का सिलसिला आज भी उसी पवित्र भाव और निरंतरता के साथ जारी है। इस महीने के तय कार्यक्रम के तहत मंदिर परिसर में एक विशेष आयोजन किया गया, जिसमें मुख्य अतिथि के तौर पर हरियाणा गऊ सेवा आयोग के चेयरमैन श्रवण गर्ग ने शिरकत की।

चेयरमैन श्रवण गर्ग की उपस्थिति में कतारबद्ध बैठे करीब 90 लाचार और जरूरतमंद परिवारों के चेहरों पर उस वक्त सुकून की लकीरें तैर गईं, जब उन्हें महीने भर का राशन (आटा, दाल, चावल, तेल, नमक, हल्दी और मसाले) ससम्मान सौंपा गया। इस मौके पर गर्ग ने कहा कि जो संस्थाएं समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की चिंता करती हैं, वही समाज की रीढ़ हैं।

मंदिर की परिभाषा बदलने वाली सोच

इस पुनीत कार्य की पृष्ठभूमि साझा करते हुए श्री कृष्ण कृपा गौशाला समिति के प्रधान जगदीश तनेजा भावुक हो उठे। उन्होंने पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताया:

“करीब तीन दशक पहले स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने हमें एक मूल मंत्र दिया था। उन्होंने कहा था कि मंदिर केवल घंटियों की गूंज और अगरबत्ती के धुएं तक सीमित नहीं रहने चाहिए। वास्तविक मंदिर वह है, जो समाज के आंसू पोंछे और लोक कल्याण का जरिया बने। बस, उसी दिन से शुरू हुआ यह सफर आज तक प्रभु कृपा से अनवरत चल रहा है।”

लाभार्थी से परोपकारी बनने का प्रेरक सफर

इस पूरे सेवा अभियान की जो सबसे खूबसूरत और भावुक करने वाली तस्वीर उभर कर सामने आई है, वह है इंसानी जज्बे की। तनेजा ने गर्व से बताया कि इस 30 साल के सफर में कई ऐसे परिवार भी रहे, जो कभी बेहद तंगहाली के दौर से गुजर रहे थे और मंदिर से मिलने वाले इस राशन पर निर्भर थे। लेकिन समय बदला, उनके बच्चों को शिक्षा और रोजगार मिला। आज वही परिवार आत्मनिर्भर होने के बाद खुद आगे आकर इस राशन फंड में अपनी गाढ़ी कमाई का हिस्सा दान कर रहे हैं। यह बदलाव इस बात का गवाह है कि जब मदद को ‘दान’ नहीं बल्कि ‘संस्कार’ बनाकर दिया जाए, तो वह समाज को बदल देती है।

राशन लेने आए बुजुर्गों और महिलाओं की आंखें कृतज्ञता से नम थीं। उन्होंने भारी मन से कहा कि महंगाई के इस दौर में जहां चूल्हा जलाना दूभर हो रहा है, वहां मंदिर से मिलने वाली यह मदद उनके लिए सिर्फ राशन की बोरी नहीं है, बल्कि समाज में सिर उठाकर जीने का हौसला और मान-सम्मान है। इस गरिमामयी आयोजन के दौरान संस्था के तमाम पदाधिकारी, सेवादार और स्थानीय प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित रहे, जिन्होंने इस सेवा यज्ञ में अपनी आहुति दी।

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