Awarapan 2 Review: इमरान हाशमी का वही पुराना दर्द और शबाना आजमी का खौफ, जानिए कैसी है फिल्म

इमरान हाशमी का वही पुराना दर्द और शबाना आजमी का खौफ, जानिए कैसी है फिल्म
Awarapan 2 Review: फिल्म की शुरुआत पहली ‘आवारापन’ के कुछ भावनात्मक फ्लैशबैक सीन्स के साथ होती है और फिर कहानी शिवम पंडित (इमरान हाशमी) की मौजूदा जिंदगी में उतरती है। अतीत के जख्मों को सीने में दफन किए शिवम अब एक अनाथालय चलाता है। उसकी बेरंग जिंदगी में खुशियों की एक छोटी सी किरण आलिया नाम की बच्ची है। कहानी में मोड़ तब आता है जब गोद लेने के नाम पर कुछ लोग आलिया को ले जाते हैं और बाद में खुलासा होता है कि वह इंटरनेशनल चाइल्ड ट्रैफिकिंग रैकेट का शिकार हो चुकी है।
बच्ची को बचाने की छटपटाहट में शिवम का संपर्क इंटरपोल अधिकारी से होता है, जो उसे इस खौफनाक गिरोह की जड़ तक पहुंचने का मिशन सौंपता है। बैंकॉक की गलियों में शिवम का सामना पूरन गब्बी और आगे चलकर एक गैंगस्टर की बेटी दिशा (दिशा पाटनी) से होता है। मिशन के इस खतरनाक मोड़ पर शिवम को न केवल मासूम बच्चों की जान बचानी है, बल्कि अपने अतीत के उस अधूरे दर्द से भी दोबारा दो-चार होना है।
कैसा है कलाकारों का अभिनय?
पूरी फिल्म का बोझ एक बार फिर इमरान हाशमी के मजबूत कंधों पर है। आंखों में वही पुराना अकेलापन, चेहरे पर गहरा दर्द और एक्शन सीन्स में जबरदस्त इंटेंसिटी—इमरान ने साबित किया है कि ‘शिवम पंडित’ का किरदार उनके बिना अधूरा है। उनका फिजीक और बदला हुआ लुक स्क्रीन पर काफी जंचता है।
फिल्म में सबसे बड़ा सरप्राइज शबाना आजमी हैं। ‘नफीसा’ के नकारात्मक किरदार में अपनी संवाद अदायगी और खामोश खौफ से वे रोंगटे खड़े कर देती हैं। वहीं दिशा पाटनी स्क्रीन पर खूबसूरत दिखी हैं और उनका काम ठीक-ठाक है, हालांकि इमोशनल सीन्स में उनके एक्सप्रेशंस कुछ जगह एक जैसे लगते हैं। पूरन गब्बी का किरदार थोड़ा और खौफनाक लिखा जा सकता था, क्योंकि इमरान हाशमी के वजनदार अभिनय के आगे उनका किरदार थोड़ा हल्का पड़ता है। सुविंदर विक्की ने अपने छोटे से रोल में भी छाप छोड़ी है।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष
निर्देशक नितिन कक्कड़ ने पहली फिल्म की उस उदास और रूहानी दुनिया को आज के दौर के क्राइम-एक्शन से जोड़ने का प्रयास किया है। शिवम के भावनात्मक संघर्ष और उसके इस खतरनाक मिशन के बीच तालमेल अच्छा बना है। हालांकि, सेकेंड हाफ में कुछ दृश्य थोड़े खिंचे हुए लगते हैं और कहानी की रफ्तार सुस्त होती है। अगर एडिटिंग टेबल पर थोड़ी और कसावट बरती जाती, तो फिल्म का असर दोगुना हो सकता था।
विष्णु राव की सिनेमैटोग्राफी फिल्म के डार्क और थ्रिलर टोन को बखूबी पेश करती है। बैंकॉक की गलियों और नाइट सीन्स के विजुअल्स काफी प्रभावी बन पड़े हैं।
कैसा है संगीत?
‘आवारापन’ फ्रैंचाइजी की सबसे बड़ी रीढ़ हमेशा से उसका संगीत रहा है। ‘आवारापन 2’ का म्यूजिक भी उसी विरासत को संभालने की ईमानदार कोशिश करता है। ‘वे जुनून’, ‘ये आवारापन’, ‘तेरे लिए’ और ‘तेरा मेरा रिश्ता कंटीन्यूज’ जैसे ट्रैक फिल्म के मिजाज में पूरी तरह रचे-बसे हैं। हालांकि 2007 वाले गानों की वह कालजयी गहराई हर एक ट्रैक में नहीं मिलती, फिर भी संगीत आपको निराश नहीं करता और थिएटर से निकलने के बाद भी जुबां पर चढ़ा रहता है।
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