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Nani Ka Ghar Summer Vacation: मम्मी, नानी के घर कब चलेंगे?’ डिजिटल दौर में भी फीका नहीं पड़ा ननिहाल का जादू; ज्योतिसर से विशेष रिपोर्ट

Nani Ka Ghar Summer Vacation: मम्मी, नानी के घर कब चलेंगे?' डिजिटल दौर में भी फीका नहीं पड़ा ननिहाल का जादू; ज्योतिसर से विशेष रिपोर्ट

Nani Ka Ghar Summer Vacation: मम्मी, नानी के घर कब चलेंगे?’ डिजिटल दौर में भी फीका नहीं पड़ा ननिहाल का जादू; ज्योतिसर से विशेष रिपोर्ट

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Nani Ka Ghar Summer Vacation: ज्योतिसर (पवन शर्मा) वक्त के पहिए ने रफ्तार पकड़ ली है, घरों के नक्शे बदल गए हैं और बच्चों के खेलने के साधन मैदानों से सिमटकर मोबाइल की स्क्रीन पर आ गए हैं। लेकिन इन तमाम बदलावों के बीच भी एक अहसास ऐसा है, जो वक्त की धूल से बिल्कुल अछूता है। वह अहसास है— नानी का घर। 1 जून से जैसे ही स्कूलों में तपती गर्मियों की छुट्टियां घोषित हुईं, जिले भर के घरों में एक ही चिर-परिचित सवाल गूंजने लगा है, “मम्मी, आखिर हम नानी के घर कब जा रहे हैं?” यह महज एक सवाल नहीं, बल्कि बचपन की उस बेफिक्री की शुरुआत है, जिसका इंतजार साल भर किया जाता है।

आज की तथाकथित डिजिटल और टेक-सैवी पीढ़ी, जिसे अक्सर वर्चुअल दुनिया में खोया हुआ माना जाता है, वह भी ननिहाल के इस सम्मोहन से खुद को मुक्त नहीं कर पाई है। हजारों बच्चे इस समय अपने नाना-नानी के आंगन में चहक रहे हैं।

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साठ साल पुराना दौर और आज की हकीकत: कुछ नहीं बदला

बुजुर्ग बताते हैं कि आज से करीब 50-60 साल पहले जब संसाधनों की भारी कमी थी, तब भी छुट्टियों का मतलब सिर्फ और सिर्फ ननिहाल हुआ करता था। उस दौर में न तो एसी गाड़ियां थीं और न ही मनोरंजन के साधन। सूती कपड़ों की एक छोटी सी गठरी बांधना, नानी के लिए हाथ से बना कोई छोटा-मोटा तोहफा सहेजना और बस या ट्रेन के सफर की वो बेचैनी ही सबसे बड़ी खुशी थी।

आश्चर्य की बात यह है कि आज जब बच्चों के पास समर कैंप, गेमिंग कन्सोल और विदेशों में घूमने के तमाम विकल्प मौजूद हैं, तब भी मामा के घर जाकर हमउम्र भाई-बहनों के साथ छत पर सोने या आम तोड़ने का जो आनंद है, उसकी तुलना किसी फाइव-स्टार रिजॉर्ट से नहीं की जा सकती। ननिहाल की यह चौखट आज भी बच्चों के लिए बिना किसी पाबंदी का वह स्वर्ग है, जहां न पढ़ाई का तनाव है और न ही सुबह जल्दी उठने की बंदिश।

रिश्तों का गणित: जब ननद और भाभी बनती हैं सूत्रधार

मायके जाने के इस सिलसिले के पीछे पारिवारिक ताने-बाने की एक बेहद खूबसूरत और व्यावहारिक कहानी भी छिपी है। छुट्टियों के दिनों में अमूमन हर घर में एक दिलचस्प संवाद सुनने को मिलता है— “दीदी, इस बार आप पहले मायके आओगी या हम बच्चों को लेकर जाएं?”

दरअसल, जब एक ही घर की बेटियां और बहुएं अपने-अपने बच्चों के साथ नानी के घर जुटना चाहती हैं, तो वहां जगह और व्यवस्थाओं का सामंजस्य बिठाना एक कला बन जाता है। यहीं पर ननद और भाभी की समझदारी काम आती है। वे आपसी तालमेल और फोन पर लंबी चर्चाओं के बाद अपना कैलेंडर इस तरह सेट करती हैं कि मां के आंगन में दोनों के बच्चों को मामा-मामी और नाना-नानी का भरपूर प्यार मिल सके। यह आपसी तालमेल ही है जो रूठने-मनाने के दौर से बचाकर इस पारंपरिक आत्मीयता को पीढ़ी दर पीढ़ी जिंदा रखे हुए है।

नानी की रसोई और नाना की कहानियों की पाठशाला

मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि ननिहाल की ये यात्राएं बच्चों के मानसिक विकास के लिए किसी टॉनिक की तरह काम करती हैं। नानी के हाथों से बने परांठे और अचार का वो स्वाद, जो दुनिया के किसी शेफ के पास नहीं मिल सकता, और रात को तारों की छांव में नाना से सुनी राजा-रानी की कहानियां, बच्चों के भीतर रिश्तों के प्रति संवेदनशीलता के बीज बोती हैं।

मामा-मामी का लाड़ और मौसी का दुलार बच्चों को यह सिखाता है कि संयुक्त परिवार में खुशियों को कैसे साझा किया जाता है। यही कारण है कि तमाम आधुनिकताओं और व्यस्तताओं के बावजूद, नानी के घर की यह अनमोल परंपरा आज भी उतनी ही शिद्दत और गर्माहट के साथ सांस ले रही है।

नानी का घर: बेफिक्र बचपन की आखिरी पनाहगाह

बदलती जीवनशैली और न्यूक्लियर फैमिली (एकल परिवार) के इस दौर में नानी का घर केवल ईंट-गारे का मकान नहीं रह गया है। यह दरअसल हमारी संस्कृति का वह कोना है जहां पहुंचकर बचपन अपनी पूरी मासूमियत के साथ खिलखिलाता है। यह वह तिजोरी है जिसमें हमारी सबसे खूबसूरत यादें, पहली शरारत और बिना शर्त मिलने वाले प्यार का खजाना हमेशा सुरक्षित रहता है।

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