July 23, 2026

Kidney Donation Case: बॉस को किडनी देकर बचाई जान, फिर छुट्टियों का बहाना बनाकर महिला कर्मचारी को नौकरी से निकाला

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Kidney Donation Case: बॉस को किडनी देकर बचाई जान, फिर छुट्टियों का बहाना बनाकर महिला कर्मचारी को नौकरी से निकाला

कॉरपोरेट बेरुखी की हद! बॉस को किडनी दी तो मिला 50 मील दूर ट्रांसफर और बर्खास्तगी का इनाम

Kidney Donation Case: इंसानियत और कारपोरेट जगत की बेरुखी का एक ऐसा मामला सोशल मीडिया पर फिर से चर्चा के केंद्र में आ गया है, जिसे सुनकर कोई भी दंग रह जाए। यह कहानी अमेरिका की रहने वाली डेबी स्टीवंस (Debbie Stevens) की है। साल 2011 में डेबी ने अपनी बॉस जैकी ब्रूसिया (Jackie Brucia) की जान बचाने के लिए जो फैसला लिया था, उसकी पूरी दुनिया में तारीफ हुई। लेकिन इस महान कदम के बदले में उन्हें जो मिला, उसने कॉरपोरेट वर्क कल्चर के क्रूर चेहरे को बेनकाब कर दिया।

दरअसल, डेबी की बॉस जैकी को किडनी ट्रांसप्लांट की सख्त जरूरत थी। डेबी ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी किडनी दान करने की प्रक्रिया में हिस्सा लिया। हालांकि, मेडिकल जांच में डेबी की किडनी सीधे तौर पर उनकी बॉस से मैच नहीं हुई। इसके बावजूद डेबी पीछे नहीं हटीं और उन्होंने ‘पेयर्ड किडनी एक्सचेंज’ (Paired Kidney Exchange) प्रोग्राम के तहत एक अन्य मरीज को अपनी किडनी दी, जिसके बदले में डोनर चेन के जरिए उनकी बॉस के लिए भी मैचिंग किडनी का इंतजाम हो गया।

सर्जरी के बाद शारीरिक दिक्कतें और फिर ऑफिस में शुरू हुआ अत्याचार

किडनी ट्रांसप्लांट की जटिल सर्जरी के बाद डेबी की तबीयत बिगड़ने लगी। उन्हें लगातार नसों में तेज दर्द और रिकवरी से जुड़ी अन्य शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। डॉक्टरों के निर्देश पर जब उन्होंने काम से कुछ दिन आराम के लिए छुट्टी मांगी, तो कहानी में एक नया और भयावह मोड़ आ गया।

डेबी का आरोप है कि जिस बॉस की जान बचाने के लिए उन्होंने अपना अंग दान किया, वही उनके प्रति बेहद कठोर और असंवेदनशील हो गईं। रिकवरी की छुट्टियों को लेकर उन्हें ताने मारे जाने लगे, ऑफिस में छोटे-छोटे ब्रेक लेने पर भी रोक लगाई गई और लगातार मानसिक रूप से परेशान किया जाने लगा। हद तो तब हो गई जब उन्हें घर से करीब 50 मील दूर एक दूसरी ब्रांच में ट्रांसफर कर दिया गया।

शिकायत दर्ज कराई तो गई नौकरी, 2014 में गोपनीय समझौते से बंद हुआ केस

जब वर्कप्लेस पर उत्पीड़न सीमा से बाहर हो गया, तो डेबी ने इसकी आधिकारिक शिकायत कंपनी प्रबंधन और संबंधित सरकारी श्रम एजेंसी से की। लेकिन न्याय मिलने के बजाय कंपनी ने बदले की कार्रवाई करते हुए उन्हें नौकरी से ही बर्खास्त कर दिया।

अचानक हुई इस बर्खास्तगी के खिलाफ डेबी ने हार नहीं मानी और अदालत का दरवाजा खटखटाया। यह मामला सालों तक मीडिया की सुर्खियों में छाया रहा और कॉरपोरेट नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़े करता रहा। आखिरकार, साल 2014 में दोनों पक्षों के बीच एक कॉन्फिडेंशियल (गोपनीय) सेटलमेंट हुआ, जिसके बाद इस कानूनी लड़ाई पर विराम लगा। आज सालों बाद यह घटना एक बार फिर इंटरनेट पर वर्कप्लेस टॉक्सिसिटी (काम की जगह पर प्रताड़ना) की बहस को जन्म दे रही है।

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