August 30, 2026

Productivity vs Work Hours: 6:30 बजते ही ऑफिस छोड़ देती थी लड़की, ओवरटाइम काम करने वालों से बेहतर दिया रिजल्ट

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Productivity vs Work Hours: 6:30 बजते ही ऑफिस छोड़ देती थी लड़की, ओवरटाइम काम करने वालों से बेहतर दिया रिजल्ट

6:30 बजते ही ऑफिस छोड़ देती थी लड़की, ओवरटाइम काम करने वालों से बेहतर दिया रिजल्ट

Productivity vs Work Hours: कॉरपोरेट जगत में अमूमन यही माना जाता है कि जो कर्मचारी देर रात तक ऑफिस में डटा रहे, वही कंपनी के प्रति सबसे वफादार और मेहनती है। लेकिन दिल्ली के एक स्टार्टअप फाउंडर की इस पारंपरिक सोच को एक युवा महिला कर्मचारी ने महज कुछ ही दिनों में पूरी तरह से बदल कर रख दिया। शाम 6:30 बजते ही बैग उठाकर ऑफिस से निकल जाने वाली एक युवा सीएफए (CFA) ने यह साबित कर दिया कि असली मायने काम के घंटों (Work Hours) के नहीं, बल्कि उस समय के दौरान दिखाई गई एफिशिएंसी और डिसिप्लिन के होते हैं।

फिंग्रोथ मीडिया (Fingrowth Media) के फाउंडर कनन बहल ने लिंक्डइन पर यह दिलचस्प किस्सा साझा किया है, जिसने कॉरपोरेट गलियारों में ‘वर्क आवर्स बनाम प्रोडक्टिविटी’ की एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

9 घंटे का काम और 13 घंटे का आउटपुट: बिना टी-ब्रेक और गॉसिप का कमाल

कनन बहल ने स्वीकार किया कि कुछ समय पहले तक उनकी सोच थी कि जो कर्मचारी बिल्कुल घड़ी देखकर ठीक समय पर ऑफिस से निकल जाते हैं, वे अतिरिक्त जिम्मेदारी लेने से बचते हैं। हालांकि, जब उन्होंने एक युवा महिला सीएफए को अपनी टीम में शामिल किया, तो शुरुआत में उसकी एक शर्त ने उन्हें असहज कर दिया। उस कर्मचारी ने साफ कह दिया था कि वह शाम 6:30 बजे के बाद एक मिनट भी दफ्तर में नहीं रुकेगी।

लेकिन काम शुरू होते ही कनन का यह संशय हमेशा के लिए दूर हो गया। उन्होंने गौर किया कि वह कर्मचारी ऑफिस में अपना एक मिनट भी गॉसिप या फालतू की बातों में नहीं गंवाती थी। न तो उसके लंबे-लंबे टी-ब्रेक होते थे और न ही वह किसी सहकर्मी से बिना वजह बातचीत करती थी। उसका पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ अपने लक्ष्य पर रहता था। नतीजा यह हुआ कि वह महज 9 घंटे के फिक्स टाइम में उतना और उससे बेहतर काम करके दे देती थी, जितना कई कर्मचारी रोजाना 13 से 14 घंटे दफ्तर में बिताकर भी नहीं कर पाते थे।

“अगर इंटरव्यू में वो सवाल पूछ लेता, तो शायद इतनी बेहतरीन एम्प्लॉई न मिलती”

कनन बहल ने अपनी पोस्ट में एक दिलचस्प बात स्वीकार की। वे अक्सर जॉब इंटरव्यू के दौरान उम्मीदवारों से पूछते थे—’क्या जरूरत पड़ने पर आप हफ्तों तक रोजाना 14-15 घंटे काम कर सकते हैं?’ लेकिन इस युवा सीएफए के इंटरव्यू के दौरान वे संयोग से यह सवाल पूछना भूल गए। कनन कहते हैं कि बाद में उन्हें इस बात की बहुत खुशी हुई कि वे यह सवाल नहीं पूछ पाए, क्योंकि अगर वे यह शर्त रखते तो शायद यह बेहतरीन और अनुशासित कर्मचारी उनकी कंपनी का हिस्सा ही नहीं बनती।

इस अनुभव ने कनन को सिखाया कि किसी भी कर्मचारी की काबिलियत का पैमाना यह नहीं हो सकता कि वह डेस्क पर कितने घंटे बैठा रहता है, बल्कि यह होना चाहिए कि वह अपने काम के घंटों में कितना प्रभावी और परिणाम देने वाला (Result-oriented) है।

लिंक्डइन पर छिड़ी बहस: ‘ओवरटाइम’ नहीं, ‘आउटपुट’ पर ध्यान दें कंपनियां

कनन बहल की इस लिंक्डइन पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर पेशेवर लोगों के बीच तीखी और विचारणीय बहस छिड़ गई है। जहां कुछ लोगों का तर्क है कि लगातार 9 घंटे बिना किसी ब्रेक के काम करना भी मेंटल हेल्थ के लिहाज से सही नहीं है और सहकर्मियों से बातचीत व छोटे ब्रेक जरूरी हैं, वहीं बहुसंख्यक यूजर्स ने फाउंडर के विचारों का समर्थन किया।

एक यूजर ने लिखा कि अब वो दौर आ गया है जब कंपनियों को इस बात की वकालत बंद कर देनी चाहिए कि कोई कुर्सी पर कितने घंटे चिपका रहा। इसके बजाय कर्मचारी की सोच, लगन, एफिशिएंसी और अंतिम नतीजों को तरजीह दी जानी चाहिए। कनन बहल का यह अनुभव एक स्पष्ट संदेश देता है कि दफ्तर में घंटों बैठा रहना और सचमुच प्रोडक्टिव होना—दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

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