Brain Stroke Risk Factors: आज के दौर में कामकाज का दबाव इतना बढ़ गया है कि हम अपनी सेहत को प्राथमिकता सूची में सबसे नीचे रख देते हैं। सुबह की शुरुआत भागदौड़ के साथ होती है, दफ्तर में कंप्यूटर के सामने घंटों कुर्सी पर बैठे रहना और शाम को थके-हारे घर लौटना। यही आजकल के शहरी जीवन का सच बन चुका है। रात में सोने से पहले भी लैपटॉप की स्क्रीन पर आंखें गड़ाए रहना और ऑफिस के पेंडिंग मैसेज चेक करना आम बात हो गई है। ज्यादातर लोग इस भागदौड़ भरे रूटीन को सिर्फ थकान मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही छोटी-सी लापरवाही आगे चलकर गंभीर बीमारियों, विशेषकर ब्रेन स्ट्रोक की वजह बन सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्ट्रोक जैसी जानलेवा स्थिति तब पैदा होती है जब दिमाग के किसी हिस्से में खून की सप्लाई अचानक रुक जाती है या फिर मस्तिष्क की कोई नस फट जाती है। हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, स्मोकिंग और बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल इसके सबसे बड़े ट्रिगर प्वाइंट्स हैं। हैरानी की बात यह है कि हमारी रोजमर्रा की कई ऐसी आदतें हैं, जो अनजाने में इन जोखिमों को हवा दे रही हैं।
लगातार बैठकर काम करना और बढ़ता मेटाबॉलिक खतरा
आधुनिक जीवनशैली में फिजिकल एक्टिविटी लगभग न के बराबर रह गई है। सुबह गाड़ी या मेट्रो से ऑफिस पहुंचना, वहां आठ-दस घंटे डेस्क के सामने लगातार बैठे रहना और घर आकर फिर आराम की मुद्रा में चले जाना—यह रूटीन शरीर को अंदर से खोखला कर रहा है। लगातार बैठे रहने की इस आदत से वजन तेजी से बढ़ता है और शरीर की मेटाबॉलिक हेल्थ बिगड़ने लगती है।
इस निष्क्रियता का सीधा असर ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर पर पड़ता है। हाई ब्लड प्रेशर की समस्या में नसों पर लगातार दबाव बनता रहता है, जिससे वक्त के साथ दिमाग की नसें कमजोर होने लगती हैं। सबसे डरावनी बात यह है कि हाई बीपी के शुरुआती दौर में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। इंसान खुद को पूरी तरह फिट महसूस करता है, जबकि अंदर ही अंदर उसका ब्लड प्रेशर खतरनाक स्तर तक बढ़ा होता है।
नींद से समझौता और तनाव का बढ़ता जाल
काम का बोझ और डेडलाइन का तनाव लोगों की नींद की गुणवत्ता को भी दीमक की तरह चाट रहा है। कल की प्रेजेंटेशन या अधूरा प्रोजेक्ट पूरा करने के चक्कर में लोग अपनी नींद के घंटों में कटौती कर रहे हैं। लगातार नींद पूरी न होने से शरीर का हार्मोनल बैलेंस बिगड़ता है, जो सीधे तौर पर ब्लड प्रेशर और मेटाबॉलिक सिस्टम को प्रभावित करता है। इसके अलावा, ‘ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया’ जैसी समस्याएं भी इन दिनों आम हो रही हैं, जिसमें सोते समय सांस बार-बार रुकती है।
तनाव हमारे पूरे खानपान और आदतों को बदल देता है। कई लोग एंग्जाइटी या स्ट्रेस के चलते स्मोकिंग शुरू कर देते हैं, जंक फूड का सेवन बढ़ा देते हैं या फिर वर्कआउट करना बिल्कुल छोड़ देते हैं। ये तमाम कारक मिलकर व्यक्ति के शरीर में स्ट्रोक के खतरे को कई गुना बढ़ा देते हैं।
क्या सिर्फ आधा घंटे की वॉक काफी है?
अक्सर लोगों का यह मानना होता है कि अगर वे सुबह या शाम को रोज आधा घंटा टहल लेते हैं, तो वे दिनभर की बाकी अनहेल्दी आदतों के असर से सुरक्षित हैं। लेकिन हकीकत इससे काफी अलग है। नियमित रूप से टहलना सेहत के लिए बेशक अच्छा है, लेकिन यह अकेले आपके खराब खानपान, धूम्रपान, हाई बीपी या डायबिटीज के दुष्प्रभावों को पूरी तरह काट नहीं सकता। स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए समग्र रूप से जीवनशैली में सुधार करना जरूरी है।
ब्रेन स्ट्रोक के खतरे से बचने के लिए रातोंरात अपनी पूरी जिंदगी बदलने की जरूरत नहीं है। इसकी शुरुआत छोटे और व्यावहारिक बदलावों से की जा सकती है। जैसे- बीच-बीच में अपनी सीट से उठकर थोड़ा टहलना, अपनी नींद के घंटों से समझौता न करना और डाइट में पौष्टिक चीजों को जगह देना। इसके अलावा, स्मोकिंग से तौबा करना और समय-समय पर अपना हेल्थ चेकअप करवाना बेहद जरूरी है। ब्लड प्रेशर की नियमित जांच कब और कितनी बार होनी चाहिए, यह आपकी उम्र और व्यक्तिगत हेल्थ प्रोफाइल पर निर्भर करता है, इसलिए डॉक्टर की सलाह जरूर लें।
इन लक्षणों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज
ब्रेन स्ट्रोक के मामलों में समय बहुत कीमती होता है। इसके शुरुआती लक्षणों को पहचानकर समय पर अस्पताल पहुंचना मरीज की जान बचा सकता है। अगर किसी व्यक्ति के चेहरे का हिस्सा अचानक एक तरफ झुकने लगे, शरीर के एक तरफ अचानक सुन्नपन या कमजोरी महसूस हो, बोलने या समझने में परेशानी हो, नजर अचानक धुंधली होने लगे या शरीर का संतुलन बिगड़ने लगे, तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

