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Chandigarh News: सुखना लेक के लिए अब बदलेगा संरक्षण का तरीका, कैचमेंट से जंगल तक होगी निगरानी

Chandigarh News: सुखना लेक के लिए अब बदलेगा संरक्षण का तरीका, कैचमेंट से जंगल तक होगी निगरानी

सुखना लेक के लिए अब बदलेगा संरक्षण का तरीका

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VVinita Kohliस्रोत: जगमार्ग रिपोर्टर- मयंक मिश्रा

Chandigarh News: सुखना लेक की खूबसूरती और पहचान उसके पानी तक सीमित नहीं है। लेक का पानी कहां से आता है, रास्ते में किस तरह की गतिविधियां होती हैं, आसपास के जंगल और गांव किस स्थिति में हैं और पानी की निकासी की व्यवस्था कैसी है—इन सभी का सीधा असर लेक के अस्तित्व और जैव विविधता पर पड़ता है। इसलिए सुखना लेक के संरक्षण की योजना भी केवल इसके पानी और किनारों तक सीमित नहीं रह सकती। पूरे कैचमेंट क्षेत्र और आसपास के इकोसिस्टम को साथ लेकर काम करना होगा। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने चंडीगढ़ में आयोजित 16वें नेशनल मीट ऑफ स्टेट बायोडायवर्सिटी बोर्ड्स एंड यूटी बायोडायवर्सिटी काउंसिल्स में सुखना लेक का उदाहरण देते हुए देश की प्रमुख वेटलैंड के लिए एकीकृत मैनेजमेंट प्लान तैयार करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वेटलैंड को केवल पानी के भंडार के रूप में देखने के बजाय उससे जुड़े पूरे लैंडस्केप को समझना जरूरी है।

सुखना लेक के संरक्षण को लेकर पंजाब के राज्यपाल एवं चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया ने भी व्यावहारिक चुनौतियां सामने रखीं। उन्होंने कहा कि प्रशासन का प्रयास रहता है कि किसी भी तरह का प्रदूषित पानी लेक में न पहुंचे, लेकिन लेक के निर्माण से पहले से ही आसपास गांव और आबादी मौजूद है। ऐसे में इन क्षेत्रों के पानी की निकासी की उचित व्यवस्था करना भी जरूरी है। कटारिया ने बताया कि कई जगह ड्रेनेज पाइपलाइन बिछाने के लिए वन क्षेत्र की जमीन की आवश्यकता पड़ती है। इससे विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती सामने आती है। उन्होंने कहा कि आबादी को हटाना संभव नहीं है। यदि गांवों में ड्रेनेज की व्यवस्था नहीं होगी तो पानी की समस्या के साथ प्रदूषण का खतरा भी बढ़ेगा।

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उन्होंने कहा कि ऐसी समस्याओं का समाधान विभागों के बीच बेहतर तालमेल से तलाशना होगा। जहां वन भूमि की जरूरत हो, वहां वैकल्पिक जमीन, प्रतिपूरक पौधरोपण और अन्य पर्यावरणीय प्रशासक ने सुखना लेक के पीछे स्थित वन क्षेत्र को भी जैव विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र अब वन्यजीवों के लिए अहम habitat बन चुका है। यदि लेक के साथ पूरे वन क्षेत्र का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण और विकास किया जाए तो चंडीगढ़ में प्रकृति आधारित पर्यटन की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं। केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि जैव विविधता संरक्षण की सोच को राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों की सीमाओं से बाहर ले जाने की जरूरत है। वाइल्डलाइफ कॉरिडोर, वेटलैंड, कृषि क्षेत्र, पवित्र वन, तटीय इकोसिस्टम और समुदायों द्वारा संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र भी जैव विविधता के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

उन्होंने हिमाचल प्रदेश की रेणुका वेटलैंड के अलावा चिल्का, सांभर और देश की अन्य प्रमुख वेटलैंड का उल्लेख करते हुए कहा कि इनके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक और समग्र प्रबंधन जरूरी है। स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रक्रिया से जोड़ना भी महत्वपूर्ण है। यादव ने बताया कि वर्ष 2014 में देश में 690 संरक्षित क्षेत्र थे, जिनकी संख्या 2026 में बढ़कर 1,134 हो गई है। इसी अवधि में संरक्षित क्षेत्रों का कुल क्षेत्रफल 1,66,851 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 1,87,592 वर्ग किलोमीटर हो गया है। उन्होंने कहा कि संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार महत्वपूर्ण है, लेकिन जैव विविधता बचाने के लिए केवल संरक्षित क्षेत्रों की संख्या और सीमा बढ़ाना पर्याप्त नहीं है।

 

2.76 लाख बायोडायवर्सिटी मैनेजमेंट समितियां

देश में अब तक 2.76 लाख से अधिक बायोडायवर्सिटी मैनेजमेंट समितियां गठित की जा चुकी हैं। अब सरकार का जोर इनकी संख्या बढ़ाने के बजाय इनके कामकाज को प्रभावी बनाने पर है। समितियों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के साथ स्थानीय समुदायों के साथ इनके समन्वय को मजबूत किया जा रहा है, ताकि स्थानीय जैव संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण में इनकी भूमिका प्रभावी हो सके। पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टरों को भी अब केवल स्थानीय पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं की सूची तक सीमित रखने के बजाय विकास योजनाओं से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। इनमें दर्ज स्थानीय जैव विविधता, पारंपरिक खेती और समुदायों के ज्ञान का इस्तेमाल जल संरक्षण, कृषि, आजीविका और सतत विकास की योजनाओं में किया जा सकता है।

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