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सिस्टम की सुस्ती पर हाईकोर्ट का 'हंटर': रक्षा सचिव और सेना प्रमुख पर 2 लाख की पेनाल्टी, कोर्ट बोला- अपनी जेब से भरें जुर्माना

May 03, 2026 1:50 PM

चंडीगढ़ (जग मार्ग)। न्यायिक आदेशों को ठंडे बस्ते में डालने की प्रशासनिक कार्यशैली पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक ऐसा प्रहार किया है, जिसकी गूंज दिल्ली के रायसीना हिल्स तक सुनाई दे रही है। एक पूर्व सैन्य अधिकारी की पेंशन रोकने के मामले में हाईकोर्ट ने देश के दो सबसे रसूखदार ओहदों—रक्षा सचिव और थल सेना प्रमुख—पर 2 लाख रुपये का हर्जाना लगाया है। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि न्याय के दरवाजे पर खड़े एक दिव्यांग फौजी को उसके हक से वंचित रखना न केवल मानवाधिकारों का हनन है, बल्कि अदालत की तौहीन भी है।

24 सर्जरी और 10 साल की सेवा का 'सिला'

यह पूरी कानूनी लड़ाई पुणे निवासी रिटायर्ड मेजर राजदीप दिनकर पंडेरे के इर्द-गिर्द घूमती है। साल 2012 में सेना में भर्ती हुए मेजर पंडेरे लेह-लद्दाख जैसे दुर्गम क्षेत्रों में तैनात रहे। कठिन परिस्थितियों में ड्यूटी के दौरान वे 'सिस्टाइटिस सिस्टिका ग्लैंडुलारिस' जैसी गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए। उनकी हालत इतनी बिगड़ी कि सेवा के दौरान उनकी 24 बार सर्जरी करनी पड़ी। साल 2022 में जब वे रिटायर हुए, तो मेडिकल बोर्ड ने उनकी दिव्यांगता को महज 15 प्रतिशत आंका और उसे सैन्य सेवा से संबंधित मानने से ही इनकार कर दिया। नतीजतन, उनकी पेंशन रोक दी गई।

ट्रिब्यूनल से लेकर हाईकोर्ट तक की अनदेखी

मेजर पंडेरे ने हार नहीं मानी और सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) का दरवाजा खटखटाया। ट्रिब्यूनल ने पाया कि जब हर बार मेडिकल बोर्ड ने उनकी बीमारी को ड्यूटी से जुड़ा बताया था, तो अंत में इसे खारिज करना गलत था। ट्रिब्यूनल ने उनकी दिव्यांगता को 50 प्रतिशत (राउंड ऑफ) मानकर पेंशन जारी करने का आदेश दिया। केंद्र सरकार इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट गई, लेकिन वहां भी उसकी दलीलें खारिज हो गईं। इसके बावजूद, महीनों बीत जाने पर भी सेना और रक्षा मंत्रालय ने पेंशन की फाइल आगे नहीं बढ़ाई।

वेतन से कटेगा पैसा: कोर्ट का कड़ा संदेश

मामले की सुनवाई कर रहीं जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने पाया कि बार-बार अवसर दिए जाने के बाद भी अधिकारी 'कुंभकर्णी नींद' में सोए हुए हैं। 30 अप्रैल को दिए अपने आदेश में जस्टिस शर्मा ने साफ कर दिया कि अब चेतावनी का वक्त निकल चुका है। उन्होंने आदेश दिया कि रक्षा सचिव और सेना प्रमुख के वेतन से बराबर-बराबर राशि काटकर याचिकाकर्ता को दी जाए। अदालत ने दो टूक कहा कि अगर अगली सुनवाई तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल नहीं हुई, तो परिणाम और भी गंभीर होंगे। यह फैसला उन अधिकारियों के लिए एक नजीर है जो न्यायिक आदेशों को लागू करने में लालफीताशाही का सहारा लेते हैं।

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