August 3, 2026

Haryana Paddy Transplantation: हरियाणा के किसानों ने बदला ट्रेंड, अगेती धान से बनाई दूरी, करनाल-ज्योतिसर बेल्ट में जल संरक्षण की नई अलख

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Haryana Paddy Transplantation: हरियाणा के किसानों ने बदला ट्रेंड, अगेती धान से बनाई दूरी, करनाल-ज्योतिसर बेल्ट में जल संरक्षण की नई अलख

जानें समय पर रोपाई के वैज्ञानिक फायदे

Haryana Paddy Transplantation: ज्योतिसर(पवन शर्मा) । धान के चालू सीजन की शुरुआत होते ही करनाल और कुरुक्षेत्र के ज्योतिसर सहित आसपास के ग्रामीण अंचलों में कृषि गतिविधियां चरम पर पहुंच गई हैं।

अमूमन जून की शुरुआत होते ही खेतों में पानी भरकर अगेती रोपाई करने की जो होड़ दिखाई देती थी, वह इस बार नदारद है। खेतों की अंतिम जुताई के बाद ट्रैक्टर शांत खड़े हैं और किसान हरियाणा सरकार द्वारा तय की गई समय सीमा का इंतजार कर रहे थे। इस बार खेतों में दिखाई दे रहा यह अनुशासन इस बात की गवाही दे रहा है कि पानी बचाने की मुहिम अब केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर भी कामयाब हो रही है। किसानों ने खुद माना है कि समय से पहले धान लगाने का ढर्रा पर्यावरण के साथ-साथ उनकी जेब पर भी भारी पड़ रहा था।

साठी धान की होड़ ने पाताल में पहुंचा दिया था पानी

करनाल कृषि विभाग में तैनात कृषि विकास अधिकारी (ADO) दिनेश शर्मा ने इस बदलाव को बेहद सकारात्मक बताया है। उन्होंने कहा कि पहले के वर्षों में कई किसान ज्यादा मुनाफे के चक्कर में अप्रैल महीने में ही ‘साठी धान’ की रोपाई कर देते थे। मकसद साफ था— मुख्य सीजन से पहले एक अतिरिक्त फसल काटकर साल में दो बार धान का बोनस उठाना।

लेकिन इस अंधी दौड़ की बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही थी। अप्रैल-मई की चिलचिलाती धूप में धान को जिंदा रखने के लिए ट्यूबवेल दिन-रात पानी उगलते थे, जिससे इलाके का वाटर टेबल (भूजल स्तर) डेंजर जोन में पहुंच गया। लागत बढ़ने के मुकाबले पैदावार और मुनाफे में कोई खास फायदा नहीं मिल रहा था।

बीमारी का कम खतरा और लागत में बड़ी बचत

कृषि विशेषज्ञों की मानें तो तय समय पर धान लगाने का फायदा सीधे तौर पर पर्यावरण और किसान दोनों की सेहत से जुड़ा है। जब मानसूनी हवाओं के रुख के साथ रोपाई होती है, तो हवा में नमी के कारण फसल की प्राकृतिक बढ़वार अच्छी होती है।

इससे पौधों में फंगस, कीट और अन्य लाइलाज बीमारियों का हमला न के बराबर होता है। जब फसल बीमार नहीं होगी, तो कीटनाशकों का अंधाधुंध खर्च बचेगा। इसके अलावा, बार-बार पानी भरने की जरूरत न पड़ने से ट्रैक्टर, डीजल और बिजली के बिल में भी तगड़ी कटौती होगी।

मुनाफा ज्यादा फसल उगाने में नहीं, बल्कि लागत घटाने में है

खेतों में उतरे आधुनिक रोपाई यंत्र और समयबद्ध तरीके से काम कर रहे अन्नदाता अब खेती के नए गणित को समझ चुके हैं। ज्योतिसर और करनाल के प्रगतिशील किसानों का कहना है कि उन्होंने अनुभव से सीखा है कि अगेती और पछेती फसल के उत्पादन में कोई खास अंतर नहीं आता। सरकार की नीतियों और बार-बार दी जा रही प्रशासनिक सलाह के बाद अब यह चेतना आई है कि असली मुनाफा पैदावार बढ़ाने से ज्यादा खेती की लागत को घटाने में है। वैज्ञानिक तरीकों और उन्नत किस्मों को अपनाकर कम पानी में भी बेहतर और भारी मुनाफा कमाया जा सकता है।

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