हरियाणा स्कूल एडमिशन: पहली कक्षा के लिए 6 साल की उम्र अनिवार्य, नियमों में बड़ा बदलाव
Apr 08, 2026 10:55 AM
हरियाणा। हरियाणा में 1 अप्रैल से शुरू हुए नए शैक्षणिक सत्र के साथ ही स्कूलों में दाखिले की प्रक्रिया तेज हो गई है। इसी बीच प्रदेश सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए स्पष्ट किया है कि अब पहली कक्षा में केवल उन्हीं बच्चों का नामांकन होगा जिन्होंने 6 साल की आयु पूरी कर ली है। सरकार ने इसके लिए बाकायदा 'हरियाणा विद्यालय शिक्षा नियम-2003' में संशोधन कर नई अधिसूचना जारी कर दी है। यह बदलाव नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को जमीन पर उतारने की कवायद का हिस्सा है, ताकि बच्चों के मानसिक विकास के अनुरूप ही उनकी पढ़ाई शुरू हो सके।
सितंबर तक उम्र पूरी करने वालों को राहत, दहिया ने जारी की अधिसूचना
स्कूल शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव विजय सिंह दहिया द्वारा जारी किए गए नए संशोधन नियम-2026 के मुताबिक, उम्र की गणना को लेकर थोड़ी लचीली व्यवस्था भी दी गई है। जो बच्चे 1 अप्रैल को 6 साल के नहीं हुए हैं, लेकिन अगले 6 महीनों यानी 30 सितंबर तक अपनी 6 साल की आयु पूरी कर लेंगे, उन्हें भी इसी सत्र में दाखिला मिल सकेगा। हालांकि, 30 सितंबर के बाद 6 साल की उम्र पूरी करने वाले बच्चों को अब एक साल का लंबा इंतजार करना होगा और उनका दाखिला अगले साल के शैक्षणिक सत्र में ही हो पाएगा।
आरटीआई एक्ट और विस्तारित अवधि का फायदा
शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) और हरियाणा नि:शुल्क शिक्षा नियमों के तहत दाखिले की इस छह महीने की विस्तारित अवधि को विशेष रूप से उन अभिभावकों के लिए रखा गया है जिनके बच्चों का जन्मदिन सत्र के बीच में आता है। जैसे ही बच्चा इस अवधि के भीतर 6 वर्ष का होगा, वह उसी दिन स्कूल में प्रवेश का पात्र बन जाएगा। पुरानी व्यवस्था में 5 साल की उम्र में दाखिला मिल जाता था, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि 6 साल की उम्र औपचारिक स्कूली शिक्षा (Primary Schooling) शुरू करने के लिए अधिक वैज्ञानिक और प्रभावी है।
छूटे हुए सिलेबस की जिम्मेदारी अब स्कूल हेड की
देरी से दाखिला लेने वाले बच्चों की पढ़ाई पर असर न पड़े, इसके लिए सरकार ने मास्टर प्लान तैयार किया है। नियम स्पष्ट करते हैं कि जो बच्चे 30 सितंबर के करीब या सत्र शुरू होने के कुछ महीनों बाद प्रवेश लेंगे, उनका पिछला सिलेबस पूरा कराने की पूरी जिम्मेदारी संबंधित स्कूल के मुखिया (Principal/Headmaster) की होगी। इसके लिए स्कूलों को विशेष प्रशिक्षण या अतिरिक्त कक्षाएं लगानी होंगी ताकि बाद में आने वाले बच्चे भी क्लास के बाकी छात्रों के साथ तालमेल बैठा सकें।