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8,848 मीटर की ऊंचाई और जमा देने वाली ठंड; जानिए क्यों आज भी हर पर्वतारोही का अंतिम ख्वाब है एवरेस्ट

May 29, 2026 10:47 AM

 International Everest Day: आज 29 मई 2026 को पूरी दुनिया 'अंतर्राष्ट्रीय एवरेस्ट दिवस' मना रही है। पर्वतारोहण और एडवेंचर की दुनिया में इस तारीख का दर्जा किसी त्योहार से कम नहीं है। यह कहानी सिर्फ पत्थरों, बर्फ और एक गगनचुंबी पहाड़ की नहीं है, बल्कि यह कहानी है इंसान की उस जिद की, जिसने प्रकृति की सबसे कठिन चुनौती को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। आज से ठीक 73 साल पहले, यानी 29 मई 1953 को जब संचार और तकनीक के साधन न के बराबर थे, तब न्यूजीलैंड के पर्वतारोही एडमंड हिलेरी और नेपाल के जांबाज शेरपा तेनजिंग नोर्गे ने वो कर दिखाया था जिसकी कल्पना तक करना उस दौर में रोंगटे खड़े कर देता था। इन दोनों शूरवीरों ने बर्फीले तूफानों, हड्डियों को जमा देने वाली ठंड और बेहद कम ऑक्सीजन के बीच माउंट एवरेस्ट (जिसे नेपाल में 'सागरमाथा' और तिब्बत में 'चोमोलुंगमा' कहा जाता है) के शिखर पर तिरंगा और अपने देशों के झंडे गाड़ दिए थे।

सर एडमंड हिलेरी के निधन के बाद नेपाल सरकार ने की थी शुरुआत

इस अंतरराष्ट्रीय दिवस को मनाने के पीछे का इतिहास भी बेहद दिलचस्प है। साल 2008 में जब एवरेस्ट फतह करने वाले पहले इंसान सर एडमंड हिलेरी ने इस दुनिया को अलविदा कहा, तो नेपाल सरकार ने उनके इस महान योगदान को अमर बनाने की कमान संभाली। नेपाल, जिसकी अर्थव्यवस्था और पहचान में एवरेस्ट का एक बड़ा योगदान है, उसने साल 2008 में ही आधिकारिक तौर पर 29 मई को 'अंतर्राष्ट्रीय एवरेस्ट दिवस' के रूप में घोषित कर दिया। तब से लेकर आज तक हर साल काठमांडू से लेकर एवरेस्ट के बेस कैंप तक कई बड़े और रूहानी कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जहां दुनिया भर के दिग्गज पर्वतारोही जुटते हैं।

मौत के कुएं (डेथ जोन) को पार कर छूते हैं 8,848 मीटर का शिखर

समुद्र तल से करीब 8,848 मीटर (8848.86 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित माउंट एवरेस्ट पर चढ़ना आज भी किसी चुनौती से कम नहीं है। हालांकि आज के पर्वतारोहियों के पास आधुनिक जीपीएस, हल्के कपड़े और बेहतर ऑक्सीजन सिलेंडर मौजूद हैं, लेकिन पहाड़ का मिजाज आज भी उतना ही कातिलाना है। 8 हजार मीटर की ऊंचाई पार करते ही शुरू होता है 'डेथ जोन', जहां हवा में ऑक्सीजन की मात्रा इतनी कम हो जाती है कि इंसान का शरीर धीरे-धीरे मरने लगता है। ऐसे में सालों की कड़ी ट्रेनिंग और जान दांव पर लगाकर ही कोई इस चोटी पर पहुंच पाता है। यही वजह है कि एवरेस्ट पर कदम रखना आज भी दुनिया के हर एडवेंचरर के लिए जिंदगी का सबसे बड़ा सपना होता है।

सिर्फ पर्वतारोहण नहीं, पर्यावरण और प्रकृति को बचाने का भी संदेश

आज के दौर में अंतर्राष्ट्रीय एवरेस्ट दिवस का महत्व सिर्फ एडवेंचर और रिकॉर्ड्स तक सीमित नहीं रह गया है। बदलते वैश्विक परिदृश्य और ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में यह दिन हमें पहाड़ों की संवेदनशीलता को समझने का संदेश भी देता है। हर साल एवरेस्ट पर बढ़ती इंसानी भीड़ और वहां फैलते कचरे ने पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है। यह दिन जहां एक तरफ हमें तेनजिंग नोर्गे और हिलेरी के साहस से प्रेरणा लेकर अपनी जिंदगी के एवरेस्ट (मुश्किलों) को फतह करना सिखाता है, वहीं दूसरी तरफ हिमालय की पारिस्थितिकी (इकोसिस्टम) को सुरक्षित और साफ रखने की हमारी सामूहिक जिम्मेदारी को भी याद दिलाता है।

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