Yamunanagar News: बोली नदी में उफान से 25 गांवों का संपर्क टूटा, 30 साल से पुल की बाट जोह रहे ग्रामीण
यमुनानगर में बोली नदी का कहर
Yamunanagar News: हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार हो रही बारिश का सीधा असर अब यमुनानगर के मैदानी इलाकों में देखने को मिल रहा है। पहाड़ों से आए पानी के तेज बहाव के कारण क्षेत्र की सूखी पड़ी बोली नदी अचानक उफान पर आ गई। नदी में पानी का स्तर इतनी तेजी से बढ़ा कि देखते ही देखते आसपास के 20 से 25 गांवों का मुख्य मार्गों से संपर्क पूरी तरह टूट गया।
नदी पर पक्का पुल न होने के कारण दोनों ओर राहगीरों और वाहनों की लंबी-लंबी कतारें लग गईं। हालात बेहद चिंताजनक हैं; अपने जरूरी काम, इलाज के लिए अस्पताल, स्कूल और दफ्तरों के लिए निकले लोग पिछले दो घंटे से ज्यादा समय से नदी के किनारे खड़े होकर पानी का बहाव कम होने की लाचारगी भरी उम्मीद लगाए बैठे हैं।
रोजमर्रा की जिंदगी थमी, अस्पताल और स्कूल जाने वाले परेशान
बोली नदी में आए अचानक उफान ने स्थानीय जनजीवन की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है। हर साल मानसून के दिनों में इस इलाके के लोगों को ऐसी ही आफत का सामना करना पड़ता है। अचानक बढ़े जलस्तर के कारण सबसे ज्यादा परेशानी उन लोगों को हो रही है जिन्हें आपातकालीन स्थिति में अस्पताल पहुंचना था या जो बच्चे सुबह स्कूल के लिए निकले थे।
सुरक्षा के लिहाज से लोगों ने उफनती नदी को पार करने का जोखिम नहीं उठाया और किनारे पर ही रुकना मुनासिब समझा। लेकिन इस इंतजार ने सैकड़ों कामकाजी लोगों और दैनिक यात्रियों के पूरे दिन के शेड्यूल को बिगाड़कर रख दिया है।
30 सालों की प्रशासनिक उपेक्षा का दंश झेल रहे ग्रामीण
नदी किनारे फंसे ग्रामीणों का गुस्सा अब फूट पड़ा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे पिछले 30 वर्षों से हर बरसात में यही दंश झेलने को मजबूर हैं। चुनाव आते ही नेता बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही वादे ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।
गुस्साए ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने पुल निर्माण के लिए पिछले तीन दशकों में क्षेत्रीय विधायकों, सांसदों और जिला प्रशासन के अधिकारियों को दर्जनों बार ज्ञापन सौंपे। इसके बावजूद आज तक समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला गया।
हर मानसून में कट जाता है इलाका
स्थानीय निवासियों का कहना है कि अगर समय रहते प्रशासन ने बोली नदी पर पुल का निर्माण करा दिया होता, तो आज हजारों लोगों को यूं सड़क पर घंटों लाचार होकर खड़ा नहीं होना पड़ता। हर साल मानसून का सीजन आते ही 20 से 25 गांवों के लोगों की जिंदगी रामभरोसे हो जाती है। जब तक पहाड़ों में बारिश का दौर जारी रहेगा, तब तक इस इलाके के लोगों को इसी तरह जान जोखिम में डालकर या घंटों इंतजार करके अपना रास्ता तय करना पड़ेगा।
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